अथर्ववेद (कांड 4)
यो दा॒धार॑ पृथि॒वीं वि॒श्वभो॑जसं॒ यो अ॒न्तरि॑क्ष॒मापृ॑णा॒द्रसे॑न । यो अस्त॑भ्ना॒द्दिव॑मू॒र्ध्वो म॑हि॒म्ना ते॑नौद॒नेनाति॑ तराणि मृ॒त्युम् ॥ (३)
जिस ओदन ने समस्त प्राणियों का भोग बनी हुई पृथ्वी को धारण किया था, जो ओदन अपने रस से अंतरिक्ष को पूर्ण करता है तथा जिस ओदन ने अपनी महत्ता से द्युलोक अर्थात् स्वर्ग को ऊपर धारण किया था, उसी ओदन की सहायता से मैं मृत्यु को पार करता हूं. (३)
The Odan who had assumed the earth that was the enjoyment of all beings, which Odan completes space with his juice and the Odan who had taken Duloka i.e. heaven above with his importance, with the help of the same Odan, I cross death. (3)