हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद 4.37.2

कांड 4 → सूक्त 37 → मंत्र 2 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

अथर्ववेद (कांड 4)

अथर्ववेद: | सूक्त: 37
त्वया॑ व॒यम॑प्स॒रसो॑ गन्ध॒र्वांश्चा॑तयामहे । अज॑शृ॒ङ्ग्यज॒ रक्षः॒ सर्वा॑न् ग॒न्धेन॑ नाशय ॥ (२)
हे अजशृंगी नाम की जड़ी! तुझे साधन बना कर हम उपद्रव करने वाली अप्सराओं और गंधर्वो का नाश करते हैं. तू राक्षसों को यहां से दूर भगा तथा अपनी गंध से सभी राक्षसों का विनाश कर. (२)
O herbs named Ajshringi! By making you a means, we destroy the apsaras and Gandharvas who create nuisance. Drive the demons away from here and destroy all the demons with your smell. (2)