अथर्ववेद (कांड 4)
उ॑द्भिन्द॒तीं सं॒जय॑न्तीमप्स॒रां सा॑धुदे॒विनी॑म् । ग्लहे॑ कृ॒तानि॑ कृण्वा॒नाम॑प्स॒रां तामि॒ह हु॑वे ॥ (१)
बाजी लगा कर धन का भेदन करती हुई एवं भलीभांति जुए में जीतने वाली एवं अक्ष शलाका आदि से अच्छी तरह जुआ खेलने वाली अप्सरा की मैं स्तुति करता हूं. सदैव दांव पर लगाए गए धन पर जुआ जीतने के चिह्न बनाने वाली उस अप्सरा को मैं यहां बुलाता हूं. (१)
I praise the apsara who penetrates the money by betting and wins in gambling well and gambles well with Aksh Shalaka etc. I call that nymph who always makes a gambling winning mark on the money at stake. (1)