अथर्ववेद (कांड 4)
सूर्य॑स्य र॒श्मीननु॒ याः स॒ञ्चर॑न्ति॒ मरी॑चीर्वा॒ या अ॑नुस॒ञ्चर॑न्ति । यासा॑मृष॒भो दू॑र॒तो वा॒जिनी॑वान्त्स॒द्यः सर्वा॑न्लो॒कान्प॒र्येति॒ रक्ष॑न् । स न॒ ऐतु॒ होम॑मि॒मं जु॑षाणो॑३ऽन्तरि॑क्षेण स॒ह वा॒जिनी॑वान् ॥ (५)
जो अप्सराएं सूर्य की किरणों के पीछे घूमती हैं अथवा सूर्य की किरणें उन के पीछे चलती हैं, उन अप्सराओं के गर्भाधान में समर्थ पति सदा उषाओं से संबंधित रहते हैं. वे सभी लोकों की रक्षा करने के लिए प्रतिदिन आते हैं. उषा के पति सूर्य अप्सराओं के साथ हमारे होम के हवि को स्वीकार करते हुए आएं. (५)
In the conception of the nymphs who roam behind the rays of the sun or the rays of the sun run behind them, the capable husband is always related to the ushas. They come every day to protect all the worlds. Come with Usha's husband Surya Apsaras accepting the havi of our home. (5)