हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद (कांड 4)

अथर्ववेद: | सूक्त: 7
वारि॒दम्वा॑रयातै वर॒णाव॑त्या॒मधि॑ । तत्रा॒मृत॒स्यासि॑क्तं॒ तेना॑ ते वारये वि॒षम् ॥ (१)
वारण वृक्ष जहां उत्पन्न होते हैं, उस वारणावती का विषहारी जल हम मनुष्यों के विष को दूर करता है. उस जल में स्वर्ग स्थित अमृत का विषनाशक प्रभाव विद्यमान है. इस कारण मैं उस अमृतमय जल से तेरे कंद, मूल आदि से उत्पन्न विष को दूर करता हूं. (१)
The poisonous water of The Varanavati, where the Varan trees are born, removes the poison of us humans. In that water, the toxic effect of nectar in heaven is present. For this reason, I remove the poison produced from your tuber, root, etc. with that nectar-rich water. (1)

अथर्ववेद (कांड 4)

अथर्ववेद: | सूक्त: 7
अ॑र॒सं प्रा॒च्यं॑ वि॒षम॑र॒सं यदु॑दी॒च्य॑म् । अथे॒दम॑धरा॒च्यं॑ कर॒म्भेण॒ वि क॑ल्पते ॥ (२)
मेरी मंत्र शक्ति से पूर्व दिशा और उत्तर दिशा में उत्पन्न होने वाला विष प्रभावहीन हो जाए. दक्षिण, पश्चिम तथा नीचे की दिशा में उत्पन्न होने वाला विष करंभ (भात) से सामर्थ्यहीन हो जाए. (२)
With my mantra power, the poison produced in the east direction and north direction becomes ineffective. The poison produced in the south, west and downward direction should become weak from the lotus (rice). (2)

अथर्ववेद (कांड 4)

अथर्ववेद: | सूक्त: 7
क॑र॒म्भं कृ॒त्वा ति॒र्यं॑ पीबस्पा॒कमु॑दार॒थिम् । क्षु॒धा किल॑ त्वा दुष्टनो जक्षि॒वान्त्स न रू॑रुपः ॥ (३)
हे दुष्ट शरीर वाले विष! बिना जाने हुए खाया हुआ तू चरबी को जलाने वाला और उदर संबंधी रोगों का जनक है. इस पुरुष ने तुझे करंभ (भात) समझ कर खाया था. तू इस पुरुष को मूर्च्छित मत बना. (३)
O poison of evil flesh! You are a fat burner and the father of abdominal diseases. This man ate you as karambh (rice). Don't make this man faint. (3)

अथर्ववेद (कांड 4)

अथर्ववेद: | सूक्त: 7
वि ते॒ मदं॑ मदावति श॒रमि॑व पातयामसि । प्र त्वा॑ च॒रुमि॑व॒ येष॑न्तं॒ वच॑सा स्थापयामसि ॥ (४)
हे मूर्च्छित करने वाली जड़ीबूटी! तेरे मूर्च्छा लाने वाले विष को मैं शरीर से इस प्रकार दूर करता हूं, जिस प्रकार धनुष से छूटा हुआ बाण दूर गिरता है. हे विष! तू गुप्त रूप से जाने वाले दूत के समान शरीर के अंगों में व्याप्त हो जाता है. मैं अपनी मंत्र शक्ति से तुझे शरीर से निकाल कर दूर करता हूं. (४)
O fainting herb! I remove the poison that brings your fainting from the body in such a way that the arrow left from the bow falls away. O poison! You permeate the body parts like a messenger who goes secretly. I remove you from the body with my mantra power. (4)

अथर्ववेद (कांड 4)

अथर्ववेद: | सूक्त: 7
परि॒ ग्राम॑मि॒वाचि॑तं॒ वच॑सा स्थापयामसि । तिष्ठा॑ वृ॒क्ष इ॑व॒ स्थाम्न्यभ्रि॑खाते॒ न रू॑रुपः ॥ (५)
हे खोदने से प्राप्त होने वाली जड़ीबूटी! जनसमूह के समान प्रभावशाली तेरे विष को भी हम अपनी मंत्र शक्ति के द्वारा शरीर से निकाल कर दूर स्थापित करते हैं. तू अपने स्थान पर वृक्ष के समान निश्चल रह तथा इस पुरुष को मूर्च्छित मत कर. (५)
O herb obtained by digging! Like the masses, we also remove your poison from the body through our mantra power and establish it away. Be as firm as a tree in your place and do not make this man faint. (5)

अथर्ववेद (कांड 4)

अथर्ववेद: | सूक्त: 7
प॒वस्तै॑स्त्वा॒ पर्य॑क्रीणन्दू॒र्शेभि॑र॒जिनै॑रु॒त । प्र॒क्रीर॑सि॒ त्वमो॑ष॒धेऽभ्रि॑खाते॒ न रू॑रुपः ॥ (६)
हे विषमूलक जड़ीबूटी! महर्षियों ने तुझे झाडू के तिनकों के बदले खरीदा है. तू हरिण आदि पशुओं के चर्म के बदले क्रय की गई है. तू बड़े परिश्रम से खरीदी गई है, इसलिए यहां से दूर हो जा और इस पुरुष को मूर्च्छित मत कर. (६)
O heterogenous herb! Maharishis have bought you in exchange for broom straws. You deer etc. have been purchased in exchange for animal skin. You have been bought with great effort, so get away from here and do not make this man faint. (6)

अथर्ववेद (कांड 4)

अथर्ववेद: | सूक्त: 7
अना॑प्ता॒ ये वः॑ प्रथ॒मा यानि॒ कर्मा॑णि चक्रि॒रे । वी॒रान्नो॒ अत्र॒ मा द॑भ॒न्तद्व॑ ए॒तत्पु॒रो द॑धे ॥ (७)
हे पुरुषो! तुम्हारे प्रतिकूल आचरण करने वाले शत्रुओं ने पहले जो यज्ञ आदि कर्म किए हैं, उन कर्मों के द्वारा वे हमारे पुत्र, पौत्र आदि को इस स्थान पर हिंसित न करें. किया जाता हुआ यह चिकित्सा कर्म मैं उन की रक्षा के लिए तुम्हारे सामने उपस्थित करता हूं. (७)
O men! Do not hide our sons, grandsons etc. in this place through the actions that the enemies who behave against you have done before. I present this medical deed done to you to protect them. (7)