हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद (कांड 5)

अथर्ववेद: | सूक्त: 1
ऋध॑ङ्मन्त्रो॒ योनिं॒ य आ॑ब॒भूव॒मृता॑सु॒र्वर्ध॑मानः सु॒जन्मा॑ । अद॑ब्धासु॒र्भ्राज॑मा॒नोऽहे॑व त्रि॒तो ध॒र्ता दा॑धार॒ त्रीणि॑ ॥ (१)
जिस के प्राण मरण रहित हैं, जो जन्म ले कर बढ़ता है, कोई भी जिस की हिंसा नहीं कर सकता, जो दिन के समान प्रकाश वाला है, जो तीनों लोकों का धारणकर्ता और पालक है, वह योनि से उत्पन्न हुआ है. (१)
Whose life is without death, who grows after birth, no one who can do violence, who is with light like day, who is the possessor and guardian of the three worlds, has been born from the vagina. (1)

अथर्ववेद (कांड 5)

अथर्ववेद: | सूक्त: 1
आ यो धर्मा॑णि प्रथ॒मः स॒साद॒ ततो॒ वपूं॑षि कृणुषे पु॒रूणि॑ । धा॒स्युर्योनिं॑ प्रथ॒म आ वि॑वे॒शा यो वाच॒मनु॑दितां चि॒केत॑ ॥ (२)
जो जीवात्मा सब से पहले धर्म का पालन करता है तथा इसी हेतु अनेक शरीरों को धारण करता है, जो संज्ञाओं के द्वारा आकृष्ट वाणी का निर्माण करता है, वह अन्न की इच्छा से योनि में सब से पहले प्रवेश करता है. (२)
The soul who follows dharma first of all and holds many bodies for this reason, who creates the speech attracted by nouns, enters the vagina first with the desire of food. (2)

अथर्ववेद (कांड 5)

अथर्ववेद: | सूक्त: 1
यस्ते॒ शोका॑य त॒न्वं॑ रि॒रेच॒ क्षर॒द्धिर॑ण्यं॒ शुच॒योऽनु॒ स्वाः । अत्रा॑ दधेते अ॒मृता॑नि॒ नामा॒स्मे वस्त्रा॑णि॒ विश॒ एर॑यन्ताम् ॥ (३)
हे वरुण! जो जीवात्मा तुम्हारे निमित्त धर्म पालन हेतु कष्ट सहता हुआ सुवर्ण के समान अपनी कीर्ति फैलाने के लिए शरीर में आया है, उसे द्यावा पृथ्वी अमरत्व प्रदान करते हैं तथा प्रजाएं वस्त्र देती हैं. (३)
O Varuna! The soul who has come into the body to spread his fame like a golden, suffering for the practice of dharma for you, gives him immortality and the people give them clothes. (3)

अथर्ववेद (कांड 5)

अथर्ववेद: | सूक्त: 1
प्र यदे॒ते प्र॑त॒रं पू॒र्व्यं गुः सदः॑सद आ॒तिष्ठ॑न्तो अजु॒र्यम् । क॒विः शु॒षस्य॑ मा॒तरा॑ रिहा॒णे जा॒म्यै धुर्यं॒ पति॑मेरयेथाम् ॥ (४)
जो उत्तम स्थान पर बैठ कर उस परमात्मा का चिंतन करते हैं, जो ब्राह्मण के हितैषी हैं तथा उसे प्राप्त कर चुके हैं, वे लोक परमात्मा की उपासना करके उस स्त्री को भी ईश्वर के दर्शन कराएं, जो प्रजा को अपनी बहन समझ कर उस का भार वहन करती है. (४)
Those who sit in the best place and think about that God, who is the well-wisher of the Brahmin and has attained it, they should worship the Lok Parmatma and make the woman also see God, who considers the people as her sister and bears the burden of it. (4)

अथर्ववेद (कांड 5)

अथर्ववेद: | सूक्त: 1
तदू॒ षु ते॑ म॒हत्पृ॑थुज्म॒न्नमः॑ क॒विः काव्ये॑ना कृणोमि । यत्स॒म्यञ्चा॑वभि॒यन्ता॑व॒भि क्षामत्रा॑ म॒ही रोध॑चक्रे वावृ॒धेते॑ ॥ (५)
पृथ्वी को स्थिर रखने वाले दो राजा पहिए के समान तेज चाल से आगे बढ़ रहे हैं. हे पृथ्वी! मैं अथर्ववेद का ज्ञाता ब्राह्मण हूं और तुम्हारे लिए अन्न भेंट करता हूं. (५)
The two kings who keep the earth stable are moving at a fast pace like a wheel. O earth! I am a Brahmin, the knower of Atharvaveda, and I offer food for you. (5)

अथर्ववेद (कांड 5)

अथर्ववेद: | सूक्त: 1
स॒प्त म॒र्यादाः॑ क॒वय॑स्ततक्षु॒स्तासा॒मिदेका॑म॒भ्यं॑हु॒रो गा॑त् । आ॒योर्ह॑ स्क॒म्भ उ॑प॒मस्य॑ नी॒डे प॒थां वि॑स॒र्गे ध॒रुणे॑षु तस्थौ ॥ (६)
मनु आदि ऋषियों ने चोरी, गुरुपत्नीगमन, ब्रह्महत्या, भ्रूणहत्या, मद्यपान, मिथ्याभाषण एवं पापकर्म — इन सात कमो के रूप में धार्मिक, मर्यादा निश्चित की है. जो इस मर्यादा को नहीं मानता, वह पापी है. इन सात मर्यादाओं का पालन करने वाला पुरुष मृत्यु के पश्चात सूर्य मंडल में स्थित आदित्य को प्राप्त करता है और प्रलय काल तक वहीं स्थित रहता है. (६)
Manu and other sages have defined dharmic limits in the form of seven acts - theft, adultery with the wife of a Guru, killing a brahmin, killing an embryo, drinking alcohol, lying and low acts. Whoever does not follow these limits is a immoral. A man who follows these seven limits attains Aditya located in the solar system after death and remains there till the pralay. (6)

अथर्ववेद (कांड 5)

अथर्ववेद: | सूक्त: 1
उ॒तामृता॑सु॒र्व्रत॑ एमि कृ॒ण्वन्नसु॑रा॒त्मा त॒न्वस्तत्सु॒मद्गुः॑ । उ॒त वा॑ श॒क्रो रत्नं॒ दधा॑त्यू॒र्जया॑ वा॒ यत्सच॑ते हवि॒र्दाः ॥ (७)
शरीर से संबंधित जो स्वयं प्रकाश उभरता है, मैं उसी का व्रती हूं. मैं अपने बल के सहारे आ रहा हूं. जो व्यक्ति इंद्र को शक्ति वाला हवि देता है, इंद्र उसे रत्न आदि धन प्रदान करते हैं. (७)
I am a devotee of the self-light that emerges related to the body. I am coming with my force. The person who gives Indra the power of power, Indra gives him gems etc. (7)

अथर्ववेद (कांड 5)

अथर्ववेद: | सूक्त: 1
उ॒त पु॒त्रः पि॒तरं॑ क्ष॒त्रमी॑डे ज्ये॒ष्ठं म॒र्याद॑मह्वयन्त्स्व॒स्तये॑ । दर्श॒न्नु ता व॑रुण॒ यास्ते॑ वि॒ष्ठा आ॒वर्व्र॑ततः कृणवो॒ वपूं॑षि ॥ (८)
क्षत्रिय जाति का पुत्र अपने पिता की पूजा करे तथा उत्तम कल्याण पाने के लिए धर्म पालन में प्रवृत्त हो. हे वरुण! अनेक स्थानों को दिखाते हुए तुम सांसारिक जीवों की रचना करते हो. (८)
The son of Kshatriya jati should worship his father and should be engaged in following dharma to get good welfare. O Varuna! By showing many places, you create worldly creatures. (8)
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