अथर्ववेद (कांड 7)
धी॒ती वा॒ ये अन॑यन्वा॒चो अग्रं॒ मन॑सा वा॒ येऽव॑दन्नृ॒तानि॑ । तृ॒तीये॑न॒ ब्रह्म॑णा वावृधा॒नास्तु॒रीये॑णामन्वत॒ नाम॑ धे॒नोः ॥ (१)
प्रजापति अथवा इंद्र और अग्ने की स्तुति करने वालों ने वाणी व्यवहार के समस्त अर्थ का ध्यान किया. जिन कहने के इच्छुकों ने देवता वाचक शब्दों के रूप में सत्य बोला, उन्होंने वृतीय ब्रह्म अर्थात् मध्यमा नामक भाषा शक्ति के द्वारा वृद्धि प्राप्त करते हुए चौथी अर्थात् वैखरी वाणी से प्रसन्न होने वाले प्रजापति का नाम उच्चारण किया. (१)
Those who praised Prajapati or Indra and Agni meditated on the whole meaning of speech behavior. Those who wanted to say the truth in the form of deity-bearing words, they attained growth through the language power called Vritya Brahma i.e. Madhyama and pronounced the name of Prajapati, who was pleased with the fourth i.e. Vaikhari speech. (1)
अथर्ववेद (कांड 7)
स वे॑द पु॒त्रः पि॒तरं॒ स मा॒तरं॒ स सू॒नुर्भु॑व॒त्स भु॑व॒त्पुन॑र्मघः । स द्यामौ॑र्णोद॒न्तरि॑क्षं॒ स्वः स इ॒दं विश्व॑मभव॒त्स आभ॑वत् ॥ (२)
भलीभांति जानने वाले पुत्रों को अनर्थ से बचाने वाला प्रजापति द्युलोक तथा पृथ्वी को जानता है. वह प्रजापति संसार के लोगों को अपनेअपने कर्म करने की प्रेरणा देता है. वह आकाश तथा पृथ्वी को अपनी महिमा से व्याप्त करता है. वह प्रजापति ही यह दिखाई देता हुआ विश्व बन गया है. (२)
Prajapati, who saved well-known sons from disaster, knows Dyulok and the earth. That Prajapati inspires the people of the world to do their own deeds. He pervades the heavens and the earth with His glory. That Prajapati has become this visible world. (2)
अथर्ववेद (कांड 7)
अथ॑र्वाणं पि॒तरं॑ दे॒वब॑न्धुं मा॒तुर्गर्भं॑ पि॒तुरसुं॒ युवा॑नम् । य इ॒मं य॒ज्ञं मन॑सा चि॒केत॒ प्र णो॑ वोच॒स्तमि॒हेह ब्र॑वः ॥ (१)
प्रजाओं के पालक देवों की सृष्टि करने वाले, माता के गर्भ से जन्म लेने वाले बालक को युवा बनाने वाले एवं गर्भ के जनक को प्राण युक्त करने वाले प्रजापति से मैं अपनी अभिलाषा की सिद्धि के लिए याचना करता हूं. उस ने इस ज्योतिहोम आदि यज्ञ को मन से जाना है. हे ब्रह्म! उस प्रजापति को मुझे बताओ. इस बात की अभिलाषा पूर्ण करने वाले यज्ञ कर्म में बताओ. (१)
I request Prajapati, who created the foster gods of the subjects, who made the child born from the mother's womb young and gave life to the father of the womb, for the fulfillment of my desire. He has known this Jyotihom etc. yajna with his heart. O Brahman! Tell me that Prajapati. Tell me in the yajna karma that fulfills this desire. (1)
अथर्ववेद (कांड 7)
अ॒या वि॒ष्ठा ज॒नय॒न्कर्व॑राणि॒ स हि घृणि॑रु॒रुर्वरा॑य गा॒तुः । स प्र॒त्युदै॑द्ध॒रुणं॒ मध्वो॒ अग्रं॒ स्वया॑ त॒न्वा त॒न्वमैरयत ॥ (१)
इस माया के द्वारा विश्व आत्मा के रूप में स्थित यह प्रजापति यज्ञ आदि कर्मो को उत्पन्न करता है. वह दीप्तिशाली उत्तम कर्म फल के लिए महान मार्ग है. वह स्थायी एवं चिरकाल तक रहने वाले मधुर जल को उत्पन्न करता है. उस ने अपने विराट शरीर के द्वारा सभी प्राणियों के शरीरों को प्रेरित किया है. (१)
Through this Maya, this Prajapati, located in the form of the world soul, produces yagya etc. He is the great path to the glorious best karma fruit. It produces permanent and lasting sweet water. He has inspired the bodies of all beings through his vast body. (1)
अथर्ववेद (कांड 7)
एक॑या च द॒शभि॑श्च सुहुते॒ द्वाभ्या॑मि॒ष्टये॑ विंश॒त्या च॑ । ति॒सृभि॑श्च॒ वह॑से त्रिं॒शता॑ च वि॒युग्भि॑र्वाय इ॒ह ता वि मु॑ञ्च ॥ (१)
हे शोभन आह्वान वाले वायु देव! सब के प्रेरक प्रजापति अपने रथ में जुड़े हुए ग्यारह घोड़ों के सहारे हमारे यज्ञ में आएं. तुम बाईस तथा तैंतीस अश्चों के द्वारा वहन किए जाते हो. हे वायु! हमारे यज्ञ में आ कर अपने घोड़ों को यहीं रोके रहो अर्थात् हमारे यज्ञ से दूसरी जगह मत जाओ. (१)
O Vayu Dev with shobhan invocation! Prajapati, the motivator of all, came to our yagna with the help of eleven horses attached in his chariot. You are borne by twenty-two and thirty-three horses. O wind! Come to our yajna and stop your horses here, that is, do not go to another place from our yajna. (1)
अथर्ववेद (कांड 7)
य॒ज्ञेन॑ य॒ज्ञम॑यजन्त दे॒वास्तानि॒ धर्मा॑णि प्रथ॒मान्या॑सन् । ते ह॒ नाकं॑ महि॒मानः॑ सचन्त॒ यत्र॒ पूर्वे॑ सा॒ध्याः सन्ति॑ दे॒वाः ॥ (१)
देवत्व को प्राप्त यजमानों ने अन्ने के द्वारा यज्ञ पूर्ण किया. अग्नि के कर्म उन के प्रमुख कर्म थे. वे महत्तव युक्त देव स्वर्ग को प्राप्त हुए. वहां प्राण के अभिमानी प्राचीन देव निवास करते हैं. (१)
The hosts who attained divinity completed the yajna through an end. The deeds of agni were their main deeds. Those important gods attained heaven. There are the arrogant ancient gods of life. (1)
अथर्ववेद (कांड 7)
य॒ज्ञो ब॑भूव॒ स आ ब॑भूव॒ स प्र ज॑ज्ञे॒ स उ॑ वावृधे॒ पुनः॑ । स दे॒वाना॒मधि॑पतिर्बभूव॒ सो अ॒स्मासु॒ द्रवि॑ण॒मा द॑धातु ॥ (२)
यज्ञ रूप प्रजापति, विश्व आत्मा के रूप में प्रसिद्ध एवं सब के कारण हुए. वे प्रसिद्ध हुए तथा वे आज भी जगत् की आत्मा के रूप में बारबार बढ़ते हैं. वे इंद्र आदि देवों में प्रमुख हुए. यह यज्ञ हम सेवकों को अधिक धन प्रदान करे. (२)
Yajna form Prajapati, famous as Vishwa Atma and caused by all. He became famous and he still grows again and again as the soul of the world. He became prominent among indra adi devas. May this yajna give more money to us servants. (2)
अथर्ववेद (कांड 7)
यद्दे॒वा दे॒वान्ह॒विषा॑ऽयज॒न्ताम॑र्त्या॒न्मन॒सा म॑र्त्येन । मदे॑म॒ तत्र॑ पर॒मे व्योम॒न्पश्ये॑म॒ तदुदि॑तौ॒ सूर्य॑स्य ॥ (३)
कर्म से देवत्व को प्राप्त जनों ने न मरने वाले इंद्र आदि देवों के हेतु देव विषयक मन से चरु, पुरोडाश आदि के द्वारा यज्ञ किया. हम यजमान उस विशाल स्वर्ग में प्रसन्न हों एवं जब तक सूर्य का प्रकाश रहे, तब तक इस यज्ञ का फल रहे. (३)
Those who got divinity from karma performed yagna through Charu, Purodash etc. with the mind of God for the gods like Indra etc. who did not die. May we hosts be happy in that vast heaven and may the fruit of this yajna remain as long as there is sunlight. (3)