हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद (कांड 8)

अथर्ववेद: | सूक्त: 2
आ र॑भस्वे॒माम॒मृत॑स्य॒ श्नुष्टि॒मच्छि॑द्यमाना ज॒रद॑ष्टिरस्तु ते । असुं॑ त॒ आयुः॒ पुन॒रा भ॑रामि॒ रज॒स्तमो॒ मोप॑ गा॒ मा प्र मे॑ष्ठाः ॥ (१)
हे आयु की कामना करने वाले पुरुष! तुम हमारे द्वारा किए जाते हुए अमरण संबंधी अनुष्ठान को अनुभव करो. तुम्हारा शरीर शत्रुओं के द्वारा छिन्नभिन्न न होने वाला तथा वृद्धावस्था को प्राप्त करने वाला हो. इस के लिए मृत्यु से छीने गए तेरे प्राणों को मैं पुनः आयु से भरता हूं. तू सत्व गुण के प्रतिबंधक रजोगुण और तमोगुण को प्राप्त न हो. तू हिंसा को भी प्राप्त न हो. (१)
O men wishing for age! You experience the immortal rituals we perform. Your body is not broken by enemies and attains old age. For this, I fill your life taken away from death with life again. You should not attain the restrictive rajoguna and tamoguna of sattva guna. You don't even get violence. (1)

अथर्ववेद (कांड 8)

अथर्ववेद: | सूक्त: 2
जीव॑तां॒ ज्योति॑र॒भ्येह्य॒र्वाङा त्वा॑ हरामि श॒तशा॑रदाय । अ॑वमु॒ञ्चन्मृ॑त्युपा॒शानश॑स्तिं॒ द्राघी॑य॒ आयुः॑ प्रत॒रं ते॑ दधामि ॥ (२)
हे पुरुष! तू मनुष्यों की ज्ञान दीप्ति प्राप्त कर के हमारे सामने आ. हम तुझे सौ संवत तक जीने के लिए मृत्यु से छीन लाए हैं. मृत्यु के ज्वर, सिरदर्द आदि पाशों से हम ने तुझे छुड़ाया है. हम तुझे निंदा से मुक्त करते हुए सौ वर्ष की दीर्घ आयु में अत्यधिक रूप से स्थापित करते हैं. (२)
O man! You receive the light of the knowledge of men and come before us. We have taken you away from death to live for a hundred samvats. We have rescued you from the fever, headache, etc. of death. We highly establish you at a long age of a hundred years, freeing you from condemnation. (2)

अथर्ववेद (कांड 8)

अथर्ववेद: | सूक्त: 2
वाता॑त्ते प्रा॒णम॑विदं॒ सूर्या॒च्चक्षु॑र॒हं तव॑ । यत्ते॒ मन॒स्त्वयि॒ तद्धा॑रयामि॒ सं वि॒त्स्वाङ्गै॒र्वद॑ जि॒ह्वयाल॑पन् ॥ (३)
हे प्राणरहित पुरुष! मैं ने तुम्हारे प्राणों को वायु से प्राप्त किया है. मैं ने तुम्हारे चक्षु को सूर्य से प्राप्त किया है तथा मैं तुम्हारे मन को तुम्हीं में धारण करता हूं. इस प्रकार तुम सभी अंगों से युक्त हो कर एवं जीभ से बोलते हुए व्यक्त उच्चारण करो. (३)
O man without life! I have received your souls from the air. I have received your eye from the sun and I hold your mind in you. In this way, you should speak with all the organs and speak with the tongue. (3)

अथर्ववेद (कांड 8)

अथर्ववेद: | सूक्त: 2
प्रा॒णेन॑ त्वा द्वि॒पदां॒ चतु॑ष्पदाम॒ग्निमि॑व जा॒तम॒भि सं ध॑मामि । नम॑स्ते मृत्यो॒ चक्षु॑षे॒ नमः॑ प्रा॒णाय॑ तेऽकरम् ॥ (४)
हे प्राणहीन पुरुष! मैं दो पैरों वाले अर्थात्‌ स्त्रीपुरुषों और चार पैरों वाले अर्थात्‌ गाय, घोड़े आदि पशुओं के प्राणों से तुझे इस प्रकार संयुक्त करता हूं, जिस प्रकार अरणि मंथन से अग्नि उत्पन्न होती है. हे मृत्यु! मैं ने तेरे क्रूर नेत्र के लिए नमस्कार किया है तथा तेरे अत्यधिक बल के लिए भी मैं नमस्कार करता हूं. (४)
O soulless man! I combine you with the lives of animals with two legs i.e. women and four feet i.e. cows, horses, etc., in such a way that agni is produced from the churning of the forest. O death! I have greeted you for your cruel eye and I also salute for your great strength. (4)

अथर्ववेद (कांड 8)

अथर्ववेद: | सूक्त: 2
अ॒यं जी॑वतु॒ मा मृ॑ते॒मं समी॑रयामसि । कृ॒णोम्य॑स्मै भेष॒जं मृत्यो॒ मा पुरु॑षं वधीः ॥ (५)
यह प्राणहीन पुरुष जीवित रहे. यह मरण को प्राप्त न हो. हम इसे चेष्टा करने के लिए प्रेरित करते हैं. हम इस मरने वाले पुरुष की चिकित्सा करते हैं. हे मृत्यु! तू इस का वध मत कर. (५)
This lifeless man survived. It should not be attained by death. We motivate you to try it. We treat this dying man. O death! Don't kill him. (5)

अथर्ववेद (कांड 8)

अथर्ववेद: | सूक्त: 2
जी॑व॒लां न॑घारि॒षां जी॑व॒न्तीमोष॑धीम॒हम् । त्रा॑यमा॒णां सह॑मानां॒ सह॑स्वतीमि॒ह हु॑वे॒ऽस्मा अ॑रि॒ष्टता॑तये ॥ (६)
जीवन देने वाली, रोष रहित, सेवन करने वाले की रक्षिका, रोग को पराजित करने वाली एवं शक्ति संपन्न जीवंती अर्थात्‌ ग्वारपाठा नामक जड़ीबूटी को व्याधियों के नाश का इच्छुक मैं इस शांति कर्म के लिए बुलाता हूं. वह इस समीपवर्ती पुरुष का रोग निवारण करे. (६)
I call for this peace deed, which gives life, without anger, protects the protector of the consuming, the disease-defeating and powerful vivity i.e. the herb called Guarpatha, who is willing to destroy the diseases. He should cure the disease of this close man. (6)

अथर्ववेद (कांड 8)

अथर्ववेद: | सूक्त: 2
अधि॑ ब्रूहि॒ मा र॑भथाः सृ॒जेमं तवै॒व सन्त्सर्व॑हाया इ॒हास्तु॑ । भवा॑शर्वौ मृ॒डतं॒ शर्म॑ यच्छतमप॒सिध्य॑ दुरि॒तं ध॑त्त॒मायुः॑ ॥ (७)
हे मृत्यु! तुम इस के पक्षपात का वचन कहो. अर्थात्‌ बोलो कि यह मेरा है. तुम इसे मारने का आरंभ मत करो. यह तुम्हारा ही जन है. यह भूलोक में सर्वत्र गति वाला बने. हे भव और शर्व! तुम इसे सुखी करो तथा इस के कल्याण का प्रयत्न करो. तुम इस के व्याधि रूपी पाप को निकाल कर इस में आयु को स्थापित करो. (७)
O death! You promise the partiality of this. That is, say that it is mine. Don't you start killing it. This is your own people. It should be moving everywhere in the earth. O Bhava and Sharva! Make it happy and try for its welfare. You remove the sin of its disease and establish age in it. (7)

अथर्ववेद (कांड 8)

अथर्ववेद: | सूक्त: 2
अ॒स्मै मृ॑त्यो॒ अधि॑ ब्रूही॒मं द॑य॒स्वोदि॒तो॒ऽयमे॑तु । अरि॑ष्टः॒ सर्वा॑ङ्गः सु॒श्रुज्ज॒रसा॑ श॒तहा॑यन आ॒त्मना॒ भुज॑मश्नुताम् ॥ (८)
हे मृत्यु! यह तुम से भयभीत है. तुम इसे बताओ कि यह तुम्हारी कृपा के योग्य है. तुम इस पर दया करो. यह अहिंसित, चक्षु आदि सभी अंगों से युक्त, उत्तम श्रोता एवं वृद्धावस्था पा कर सौ वर्षों तक अन्य जनों की अपेक्षा अधिक भोग प्राप्त करे. (८)
O death! It's afraid of you. You tell it that it is worthy of your grace. You have mercy on it. It should be non-violent, with all the organs like eyes, etc., getting a good audience and old age and getting more enjoyment than other people for a hundred years. (8)
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