हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद 8.4.11

कांड 8 → सूक्त 4 → मंत्र 11 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

अथर्ववेद (कांड 8)

अथर्ववेद: | सूक्त: 4
प॒रः सो अ॑स्तु त॒न्वा॒ तना॑ च ति॒स्रः पृ॑थि॒वीर॒धो अ॑स्तु॒ विश्वाः॑ । प्रति॑ शुष्यतु॒ यशो॑ अस्य देवा॒ यो मा॒ दिवा॒ दिप्स॑ति॒ यश्च॒ नक्त॑म् ॥ (११)
हे देवो! वह राक्षस अपने शरीर से और अपने पुत्रों से अलग हो जाए. वह तीनों प्रकार की पृथ्वी के नीचे पहुंचे अर्थात्‌ नरक को प्राप्त हो. उस पापी का अन्न एवं यश नष्ट हो जाए. जो द्वेषकर्ता दिन अथवा रात में मुझे मारना चाहता है, उस का विनाश करो. (११)
O God! May that demon be separated from his body and from his sons. He reached the bottom of all three types of earth, that is, hell should be attained. Let the food and fame of that sinner be destroyed. Destroy the spiteur who wants to kill me day or night. (11)