हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद 8.4.13

कांड 8 → सूक्त 4 → मंत्र 13 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

अथर्ववेद (कांड 8)

अथर्ववेद: | सूक्त: 4
न वा उ॒ सोमो॑ वृजि॒नं हि॑नोति॒ न क्ष॒त्रियं॑ मिथु॒या धा॒रय॑न्तम् । हन्ति॒ रक्षो॒ हन्त्यास॒द्वद॑न्तमु॒भाविन्द्र॑स्य॒ प्रसि॑तौ शयाते ॥ (१३)
सोमदेव पापी राक्षस को जीवित रहने के लिए नहीं छोड़ते हैं. असत्य को धारण करने वाले पापी राक्षस को भी सोमदेव जीवित रहने के लिए नहीं छोड़ते हैं. सोमदेव राक्षस का विनाश करते हैं और असत्यवादी का भी विनाश करते हैं. ये दोनों इंद्र के पाश में बंध जाते हैं. (१३)
Somdev does not leave the sinful monster to survive. Somdev also does not leave the sinful demon who holds the untruth to survive. Somdev destroys the demon and also destroys the untruthful. Both of them are tied in Indra's loop. (13)