अथर्ववेद (कांड 9)
अ॑न्त॒रा द्यां च॑ पृथि॒वीं च॒ यद्व्यच॒स्तेन॒ शालां॒ प्रति॑ गृह्णामि त इ॒माम् । यद॒न्तरि॑क्षं॒ रज॑सो वि॒मानं॒ तत्कृ॑ण्वे॒ऽहमु॒दरं॑ शेव॒धिभ्यः॑ । तेन॒ शालां॒ प्रति॑ गृह्णामि॒ तस्मै॑ ॥ (१५)
द्यौ और पृथ्वी के मध्य जो विस्तृत आकाश हैं, उस के द्वारा हम तेरी इस शाला को ग्रहण करते हैं. अंतरिक्ष और पृथ्वी की जो रचना शक्ति है, वह तेरे उदर में स्थित है. (१५)
Through the wide heavens between the earth and the earth, we receive this school of yours. The creation power of space and earth is located in your stomach. (15)