अथर्ववेद (कांड 9)
आ न॑यै॒तमा र॑भस्व सु॒कृतां॑ लो॒कमपि॑ गच्छतु प्रजा॒नन् । ती॒र्त्वा तमां॑सि बहु॒धा म॒हान्त्य॒जो नाक॒मा क्र॑मतां तृ॒तीय॑म् ॥ (१)
इस अज को लाओ और यज्ञ कर्म आरंभ करो. जानता हुआ यह पुण्यात्माओं के लोक को भी जाए. यह अनेक प्रकार के विशाल अंधकारों को पार कर के तीसरे स्वर्ग में पहुंचे. (१)
Bring this aj and start the yajna karma. Knowing that it should also go to the world of the saints. He overcame many types of vast darknesses and reached the third heaven. (1)
अथर्ववेद (कांड 9)
इन्द्रा॑य भा॒गं परि॑ त्वा नयाम्य॒स्मिन्य॒ज्ञे यज॑मानाय सू॒रिम् । ये नो॑ द्वि॒षन्त्यनु॒ तान्र॑भ॒स्वाना॑गसो॒ यज॑मानस्य वी॒राः ॥ (२)
हे अज! मैं इस यज्ञ में तुझे इंद्र के भाग के लिए यजमान के समीप ले जा रहा हूं. जो हमारे शन्रु हैं, तू उन पर पैर रख और यजमान के पुत्र आदि को पाप रहित बना. (२)
O Aj! I am taking you to the host for Indra's part in this yajna. Set your feet on those who are our peace, and make the host's sons, etc., sinless. (2)
अथर्ववेद (कांड 9)
प्र प॒दोऽव॑ नेनिग्धि॒ दुश्च॑रितं॒ यच्च॒चार॑ शु॒द्धैः श॒फैरा क्र॑मतां प्रजा॒नन् । ती॒र्त्वा तमां॑सि बहु॒धा वि॒पश्य॑न्न॒जो नाक॒मा क्र॑मतां तृ॒तीय॑म् ॥ (३)
हे पाप कर्म करने वाले अज! तू अपने पैरों को पवित्र कर एवं जानता हुआ अपने खुरों से स्वर्ग में आरोहण कर. यह अज अनेक प्रकार के अंधकारों को पार करता हुआ तृतीय स्वर्ग में पहुंचे. (३)
O one who commits sin! Sanctify your feet and ascend to heaven with your hooves, knowing. This aj reached the third heaven, crossing many types of darkness. (3)
अथर्ववेद (कांड 9)
अनु॑छ्य श्या॒मेन॒ त्वच॑मे॒तां वि॑शस्तर्यथाप॒र्वसिना॒ माभि मं॑स्थाः । माभि द्रु॑हः परु॒शः क॑ल्पयैनं तृ॒तीये॒ नाके॒ अधि॒ वि श्र॑यैनम् ॥ (४)
हे विशस्त! अर्थात् विशेष शासक काले लोहे के शस्त्र के द्वारा इस को शुद्ध करो. इस के जोड़ों को कष्ट न हो. इस के प्रत्येक जोड़ की कल्पना करते हुए इसे तीसरे स्वर्ग में पहुंचाओ. (४)
O vishvast! That is, purify it by special ruler black iron weapon. Do not hurt the joints of this. Imagine each addition of this and deliver it to the third heaven. (4)
अथर्ववेद (कांड 9)
ऋ॒चा कु॒म्भीमध्य॒ग्नौ श्र॑या॒म्या सि॑ञ्चोद॒कमव॑ धेह्येनम् । प॒र्याध॑त्ता॒ग्निना॑ शमितारः शृ॒तो ग॑च्छतु सु॒कृतां॒ यत्र॑ लो॒कः ॥ (५)
मैं ऋग्वेद के मंत्रों के द्वारा कुंभी को अग्नि पर रखता हूं. तू जल छिड़क कर इसे अग्नि पर रख. हे शमिता जनो! यह शुद्ध अर्थात् परिपक्व हो कर पुण्यवानों के लोक को जाए. (५)
I keep the kumbhi on agni through the mantras of rigveda. Sprinkle water and put it on the agni. O Shamita! It should be pure, that is, mature and go to the world of virtuous. (5)
अथर्ववेद (कांड 9)
उत्क्रा॒मातः॒ परि॑ चे॒दत॑प्तस्त॒प्ताच्च॒रोरधि॒ नाकं॑ तृ॒तीय॑म् । अ॒ग्नेर॒ग्निरधि॒ सं ब॑भूविथ॒ ज्योति॑ष्मन्तम॒भि लो॒कं ज॑यै॒तम् ॥ (६)
हे अज! तू इस तपे हुए अर्थात् परिपक्व चर के द्वारा स्वर्ग में जाने के लिए ऊपर चढ़. तू अन्ने के द्वारा अग्नि रूप हो गया है एवं प्रकाश वाले लोकों को प्राप्त कर. (६)
O Aj! You climb up to go to heaven by this hot i.e. mature variable. You have become a form of agni through the unknown and attain the worlds of light. (6)
अथर्ववेद (कांड 9)
अ॒जो अ॒ग्निर॒जमु॒ ज्योति॑राहुर॒जं जीव॑ता ब्र॒ह्मणे॒ देय॑माहुः । अ॒जस्तमां॒स्यप॑ हन्ति दू॒रम॒स्मिंल्लो॒के श्र॒द्दधा॑नेन द॒त्तः ॥ (७)
मनीषियों ने ऐसा कहा है कि अज ही अग्नि है और अज ही ज्योति है. जीवित पुरुष के द्वारा अज को ब्रह्म के लिए देने योग्य कहा गया है. शद्धालु पुरुष द्वारा इस लोक में दान किया हुआ अज दूरवर्ती लोकों में अंधकार का विनाश करता है. (७)
Mystics have said that aj is agni and aj is light. Aj has been said to be worthy of giving to Brahman by the living man. The aj donated to this world by the wise man destroys darkness in the distant worlds. (7)
अथर्ववेद (कांड 9)
पञ्चौ॑दनः पञ्च॒धा वि क्र॑मतामाक्रं॒स्यमा॑न॒स्त्रीणि॒ ज्योतीं॑षि । ई॑जा॒नानां॑ सु॒कृतां॒ प्रेहि॒ मध्यं॑ तृ॒तीये॒ नाके॒ अधि॒ वि श्र॑यस्व ॥ (८)
पंचौदन अर्थात् पांच प्रकार के भातों के पांच क्रम दिए जाएं. वह आक्रमण करता हुआ सूर्य, चंद्र, अग्नि-इन तीनों ज्योतियों में आरूढ़ हो. तू यज्ञ करने वाले पुण्यात्माओं के मध्य में जा कर तीसरे स्वर्ग को प्राप्त हो. (८)
Panchaudan i.e. five orders of five types of rice should be given. He is mounted in the three lights - sun, moon, agni - attacking. You go among the virtuous souls who perform yajna and attain the third heaven. (8)