ऋग्वेद (मंडल 1)
याभिः॒ परि॑ज्मा॒ तन॑यस्य म॒ज्मना॑ द्विमा॒ता तू॒र्षु त॒रणि॑र्वि॒भूष॑ति । याभि॑स्त्रि॒मन्तु॒रभ॑वद्विचक्ष॒णस्ताभि॑रू॒ षु ऊ॒तिभि॑रश्वि॒ना ग॑तम् ॥ (४)
हे अश्विनीकुमारो! चारों ओर गमनशील वायु अपने पुत्र एवं माताओं से उत्पन्न अग्नि के बल से युक्त होकर तथा पालनोपायों द्वारा धावनशीलों में अति शीघ्रगामी बनकर सर्वत्र व्याप्त हो जाता है. जिन उपायों द्वारा कक्षीवान् ऋषि विशिष्ट ज्ञानयुक्त हुए थे, उन्हीं उपायों द्वारा आओ. (४)
O Ashwinikumaro! The air that moves around is filled with the force of fire produced by its sons and mothers and becomes very quick to the runners by the cradles. Come by the same measures by which the sages of The Kantivana were imparted specific knowledge. (4)