ऋग्वेद (मंडल 1)
नास॑त्याभ्यां ब॒र्हिरि॑व॒ प्र वृ॑ञ्जे॒ स्तोमा॑ँ इयर्म्य॒भ्रिये॑व॒ वातः॑ । यावर्भ॑गाय विम॒दाय॑ जा॒यां से॑ना॒जुवा॑ न्यू॒हतू॒ रथे॑न ॥ (१)
जिस प्रकार कोई यजमान यज्ञ के निमित्त कुश छेदन करता है अथवा वायु बादलों के जल को प्रेरित करता है, उसी प्रकार मैं अश्चिनीकुमारों की पर्याप्त स्तुति करता हूं. उन्होंने किशोर विमद को अपने रथ द्वारा शत्रुओं से पहले ही स्वयंवर में पहुंचाकर पत्नी प्राप्त कराई थी. उनके रथ को शत्रु सेना नहीं पा सकी. (१)
Just as a host pierces kusha for the sake of yajna or inspires the water of the air clouds, so I praise the Ashchinikumaras enough. He had got kishore Vimad's wife by transporting her to swayamvar before the enemies with his chariot. His chariot could not be found by the enemy army. (1)