ऋग्वेद (मंडल 1)
अजो॑हवीन्नासत्या क॒रा वां॑ म॒हे याम॑न्पुरुभुजा॒ पुरं॑धिः । श्रु॒तं तच्छासु॑रिव वध्रिम॒त्या हिर॑ण्यहस्तमश्विनावदत्तम् ॥ (१३)
हे लंबे हाथों वाले अश्विनीकुमारो! परम बुद्धिमती ऋषिपत्नी वध्रिमती ने अपने पूजनीय स्तोत्र में तुम अभिमत फलदाताओं को बार-बार बुलाया था. तुमने शिष्य के समान उसकी पुकार सुनी एवं उसे हिरण्यहस्त नाम का पुत्र दिया. (१३)
O long-handed Ashwinikumaro! The ultimate wise sage wife Vadrimati had repeatedly called you the fruit-givers in her revered hymn. You heard his call as a disciple and gave him a son named Hiranyahasta. (13)