ऋग्वेद (मंडल 1)
आ वां॒ रथं॑ दुहि॒ता सूर्य॑स्य॒ कार्ष्मे॑वातिष्ठ॒दर्व॑ता॒ जय॑न्ती । विश्वे॑ दे॒वा अन्व॑मन्यन्त हृ॒द्भिः समु॑ श्रि॒या ना॑सत्या सचेथे ॥ (१७)
हे अश्चिनीकुमारो! जिस प्रकार दौड़ने वाले घोड़ों में सबसे आगे वाला निश्चित स्थान पर गड़ी लकड़ी तक पहले पहुंचता है, उसी प्रकार अवधि पर शीघ्र पहुंचने वाले घोड़ों के कारण सूर्यपुत्री सूर्या तुम्हारे रथ पर बैठ गई. सारे देवों ने सहर्ष यह बात मान ली और तुमने कांति प्राप्त की. (१७)
O aschinikumaro! Just as the one at the forefront of the running horses reaches the hardwood first at a certain place, so suryaputri surya sat on your chariot because of the horses that reached the period early. All the gods gladly accepted this, and you have received the gift. (17)