हरि ॐ

ऋग्वेद (Rigved)

ऋग्वेद 1.116.3

मंडल 1 → सूक्त 116 → श्लोक 3 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

ऋग्वेद (मंडल 1)

ऋग्वेद: | सूक्त: 116
तुग्रो॑ ह भु॒ज्युम॑श्विनोदमे॒घे र॒यिं न कश्चि॑न्ममृ॒वाँ अवा॑हाः । तमू॑हथुर्नौ॒भिरा॑त्म॒न्वती॑भिरन्तरिक्ष॒प्रुद्भि॒रपो॑दकाभिः ॥ (३)
हे अश्विनीकुमारो! जिस प्रकार कोई मरता हुआ व्यक्ति धन का त्याग करता है, उसी प्रकार शन्रुपीड़ित तुग्र ने अपने पुत्र थुज्यु को शत्रु विजय के लिए नाव से गमन करने के निमित्त सागर में भेजा. तुमने सागर में डूबते हुए भुज्यु को अंतरिक्ष में चलने वाली एवं जलप्रवेशरहित अपनी नाव द्वारा तुग्र के पास पहुंचाया था. (३)
O Ashwinikumaro! Just as a dying person renounces wealth, so the shanrupid Tugrued Tughra sent his son Thooju into the sea to travel by boat for enemy conquest. You had taken Bhujyu, who was drowning in the sea, to Tugrah by your boat, which was moving in space and without water. (3)