हरि ॐ

ऋग्वेद (Rigved)

ऋग्वेद 1.116.5

मंडल 1 → सूक्त 116 → श्लोक 5 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

ऋग्वेद (मंडल 1)

ऋग्वेद: | सूक्त: 116
अ॒ना॒र॒म्भ॒णे तद॑वीरयेथामनास्था॒ने अ॑ग्रभ॒णे स॑मु॒द्रे । यद॑श्विना ऊ॒हथु॑र्भु॒ज्युमस्तं॑ श॒तारि॑त्रां॒ नाव॑मातस्थि॒वांस॑म् ॥ (५)
हे अश्विनीकुमारो! तुमने सागर में डूबते हुए भुज्यु को सौ डांडों से चलने वाली नौका में बैठाकर अपने घर पहुंचाया था. वह सागर आलंबनरहित, भू प्रदेश से भिन्न, हाथ से पकड़ने योग्य शाखा आदि से हीन था, जिसमें तुमने यह पराक्रम किया. (५)
O Ashwinikumaro! You took Bhujyu, who was drowning in the sea, to your home in a boat that runs on a hundred poles. The sea was unfazed, apart from the land, inferior to the hand-holding branch, etc., in which you performed this feat. (5)