ऋग्वेद (मंडल 1)
यु॒वं न॑रा स्तुव॒ते प॑ज्रि॒याय॑ क॒क्षीव॑ते अरदतं॒ पुरं॑धिम् । का॒रो॒त॒राच्छ॒फादश्व॑स्य॒ वृष्णः॑ श॒तं कु॒म्भाँ अ॑सिञ्चतं॒ सुरा॑याः ॥ (७)
हे नेताओ! तुमने स्तुति करने वाले अंगिरागोत्रीय कक्षीवान् को पर्याप्त बुद्धि दी थी. जिस प्रकार शराब बनाने वाले कारोतर नामक पात्र से सुरा का आसवन करते हैं, उसी प्रकार तुमने अपने सवन-समर्थ अश्व के खुर से सौ घड़े शराब निकाली. (७)
Hey leaders! You gave enough wisdom to the angiragotrian orbital who praised him. Just as the brewers distill the sura from a vessel called Karotar, so you took out a hundred pitchers of wine from the hoof of your swan-capable horse. (7)