ऋग्वेद (मंडल 1)
का रा॑ध॒द्धोत्रा॑श्विना वां॒ को वां॒ जोष॑ उ॒भयोः॑ । क॒था वि॑धा॒त्यप्र॑चेताः ॥ (१)
हे अश्विनीकुमारो! कौन सी स्तुति तुम्हें प्रसन्न बना सकती है? तुम्हें प्रसन्न करने में कौन सा होता समर्थ है? तुम्हारे महत्त्व को न जानने वाला तुम्हारी सेवा कैसे कर सकता है. (१)
O Ashwinikumaro! What praise can make you happy? Who is capable of pleasing you? How can anyone who does not know your importance serve you? (1)
ऋग्वेद (मंडल 1)
वि॒द्वांसा॒विद्दुरः॑ पृच्छे॒दवि॑द्वानि॒त्थाप॑रो अचे॒ताः । नू चि॒न्नु मर्ते॒ अक्रौ॑ ॥ (२)
अज्ञ स्तोता इसी प्रकार तुम सर्वज्ञों की सेवा रूपी मार्ग को जानना चाहता है. उनके अतिरिक्त सब ज्ञानहीन हैं. शत्रु द्वारा आक्रमणरहित वे शीघ्र ही स्तोता पर अनुग्रह करते हैं. (२)
The ignorant stota similarly wants you to know the way of service to the omniscient. All but them are ignorant. Uninvaded by the enemy they soon do grace the hymn. (2)
ऋग्वेद (मंडल 1)
ता वि॒द्वांसा॑ हवामहे वां॒ ता नो॑ वि॒द्वांसा॒ मन्म॑ वोचेतम॒द्य । प्रार्च॒द्दय॑मानो यु॒वाकुः॑ ॥ (३)
तुम सर्वज्ञों को हम बुलाते हैं. हे अभिज्ञो! तुम आज हमें ज्ञातव्य स्तोत्र बताओ. तुम्हारी कामना करता हुआ मैं तुमको हव्य देकर भली-भांति स्तुति करता हूं. (३)
You omniscient we call. O you know! You tell us the known hymn today. While wishing you, I praise you well. (3)
ऋग्वेद (मंडल 1)
वि पृ॑च्छामि पा॒क्या॒३॒॑ न दे॒वान्वष॑ट्कृतस्याद्भु॒तस्य॑ दस्रा । पा॒तं च॒ सह्य॑सो यु॒वं च॒ रभ्य॑सो नः ॥ (४)
हे दर्शनीयो! मैं तुम्हीं से पूछना चाहता हूं, अन्य पक्व-बुद्धि देवों से नहीं. तुम वषट्कार के साथ अनने में डाले गए सोमरस को पिओ एवं प्रौढ़ बनाओ. (४)
O you see! I want to ask you, not to other god-wise gods. You drink the somras that you put in the anana with the year-to-day and make it mature. (4)
ऋग्वेद (मंडल 1)
प्र या घोषे॒ भृग॑वाणे॒ न शोभे॒ यया॑ वा॒चा यज॑ति पज्रि॒यो वा॑म् । प्रैष॒युर्न वि॒द्वान् ॥ (५)
घोषापुत्र सुहस्त्य एवं ऋषि जिस स्तुति से सुशोभित हुए थे, अन्न की इच्छा करता हुआ पत्रिवंशी मैं कक्षीवान् उसी स्तुति से तुम्हारी प्रशंसा करके सफल बनूं, (५)
The praise with which the gavaputra suhastya and the sages were adorned, i will desire food, i will be successful by praising you with the same praise as the chamber, (5)
ऋग्वेद (मंडल 1)
श्रु॒तं गा॑य॒त्रं तक॑वानस्या॒हं चि॒द्धि रि॒रेभा॑श्विना वाम् । आक्षी शु॑भस्पती॒ दन् ॥ (६)
हे अश्विनीकुमार! अटक-अटक कर चलते हुए अंधे ऋषि ऋजाश्च की स्तुति सुनो. हे शोभन पालको! उसने भी मेरे ही समान स्तुति करके आंखें पाई थीं. (६)
O Ashwinikumar! Listen to the praises of the blind sage Rizash while walking. O shobhan palko! He too had eyes with the same praise as me. (6)
ऋग्वेद (मंडल 1)
यु॒वं ह्यास्तं॑ म॒हो रन्यु॒वं वा॒ यन्नि॒रत॑तंसतम् । ता नो॑ वसू सुगो॒पा स्या॑तं पा॒तं नो॒ वृका॑दघा॒योः ॥ (७)
हे गृहदाताओ! महान् धन के दाता एवं नाशक तुम हमारे रक्षक बनो एवं हमें पापी वृक से बचाओ. (७)
O housegivers! giver and destroyer of great wealth, be our protectors and save us from the immoral Vrak. (7)
ऋग्वेद (मंडल 1)
मा कस्मै॑ धातम॒भ्य॑मि॒त्रिणे॑ नो॒ माकुत्रा॑ नो गृ॒हेभ्यो॑ धे॒नवो॑ गुः । स्त॒ना॒भुजो॒ अशि॑श्वीः ॥ (८)
हमें किसी शत्रु के सामने उपस्थित मत करो. हमारे घरों की दुधारू गाएं बछड़ों से बिछड़ कर किसी अगम्य स्थान में न जाएं. (८)
Don't put us before an enemy. Do not go to any inaccessible place by being separated from the calves of our houses. (8)