ऋग्वेद (मंडल 1)
प्रा॒ता रत्नं॑ प्रात॒रित्वा॑ दधाति॒ तं चि॑कि॒त्वान्प्र॑ति॒गृह्या॒ नि ध॑त्ते । तेन॑ प्र॒जां व॒र्धय॑मान॒ आयू॑ रा॒यस्पोषे॑ण सचते सु॒वीरः॑ ॥ (१)
स्वनय नाम का राजा प्रातःकाल आकर मेरे समीप रत्न रखे. ज्ञानी कक्षीवान् अर्थात् मैंने उन्हें स्वीकार किया एवं उनके द्वारा पुत्र, सेवक एवं अपनी अवस्था में वृद्धि करके राजा को आशीर्वाद दिया है कि वह बार-बार धन प्राप्त करे. (१)
A king named Svanya came in the morning and placed a gemstone near me. I have accepted them and have blessed the king by increasing his state of being a son, a servant, and by increasing his state, that he may receive wealth again and again. (1)
ऋग्वेद (मंडल 1)
सु॒गुर॑सत्सुहिर॒ण्यः स्वश्वो॑ बृ॒हद॑स्मै॒ वय॒ इन्द्रो॑ दधाति । यस्त्वा॒यन्तं॒ वसु॑ना प्रातरित्वो मु॒क्षीज॑येव॒ पदि॑मुत्सि॒नाति॑ ॥ (२)
यह स्वनय राजा बहुत सी गायों, स्वर्ण और घोड़ों का स्वामी है. इंद्र इन्हें अतुल संपत्ति दें. जिस प्रकार पशु-पक्षी आदि को रस्सी से बांध लिया जाता है, उसी प्रकार राजा ने प्रातःकाल ही पैदल आकर जाने वाले यात्री कक्षीवान् को जाने नहीं दिया. (२)
This golden king is the lord of many cows, gold and horses. Indra give them incredible property. Just as animals and birds, etc., are tied with a rope, the king did not allow the pilgrim, who came on foot in the morning, to leave. (2)
ऋग्वेद (मंडल 1)
आय॑म॒द्य सु॒कृतं॑ प्रा॒तरि॒च्छन्नि॒ष्टेः पु॒त्रं वसु॑मता॒ रथे॑न । अं॒शोः सु॒तं पा॑यय मत्स॒रस्य॑ क्ष॒यद्वी॑रं वर्धय सू॒नृता॑भिः ॥ (३)
मैं शोभनकर्मा एवं यज्ञरक्षक को देखने के लिए धनयुक्त रथ में बैठकर आज आया हूं. प्रकाशयुक्त एवं मादकता प्रदान करने वाले सोमरस को पिओ तथा सुंदर पुत्र, भृत्य आदि की कामना करो. (३)
I have come today to sit in a rich chariot to see Shobhankarma and the yajnarakshak. Drink the light and intoxicating Someras and wish for a beautiful son, bhritya, etc. (3)
ऋग्वेद (मंडल 1)
उप॑ क्षरन्ति॒ सिन्ध॑वो मयो॒भुव॑ ईजा॒नं च॑ य॒क्ष्यमा॑णं च धे॒नवः॑ । पृ॒णन्तं॑ च॒ पपु॑रिं च श्रव॒स्यवो॑ घृ॒तस्य॒ धारा॒ उप॑ यन्ति वि॒श्वतः॑ ॥ (४)
सुख देने वाली एवं दुधारू गाएं यज्ञकर्ता और यज्ञ का संकल्प करने वाले के पास जाकर उसे दूध देती हैं. पितरों को तर्पण करने वाले एवं प्राणियों को प्रसन्न करने वाले पुरुष के समीप समृद्धि देने वाली घृतधाराएं आकर संतोष देती हैं. (४)
Happy and milch sings, they go to the yajnakarta and the one who resolves to the yajna and give him milk. The abrasive streams that give prosperity to the man who gives tarpan to the fathers and who please the beings come and give satisfaction. (4)
ऋग्वेद (मंडल 1)
नाक॑स्य पृ॒ष्ठे अधि॑ तिष्ठति श्रि॒तो यः पृ॒णाति॒ स ह॑ दे॒वेषु॑ गच्छति । तस्मा॒ आपो॑ घृ॒तम॑र्षन्ति॒ सिन्ध॑व॒स्तस्मा॑ इ॒यं दक्षि॑णा पिन्वते॒ सदा॑ ॥ (५)
हव्य देकर देवों को प्रसन्न करने वाला स्वर्ग में पहुंचकर देवों के बीच बैठता है. बहता हुआ जल उसे तेज एवं धरती फसलों द्वारा उसे संतोष देती है. (५)
The one who pleases the gods by giving a havya reaches heaven and sits among the gods. The flowing water gives him fast and the earth gives him satisfaction by the crops. (5)
ऋग्वेद (मंडल 1)
दक्षि॑णावता॒मिदि॒मानि॑ चि॒त्रा दक्षि॑णावतां दि॒वि सूर्या॑सः । दक्षि॑णावन्तो अ॒मृतं॑ भजन्ते॒ दक्षि॑णावन्तः॒ प्र ति॑रन्त॒ आयुः॑ ॥ (६)
दान देने वाले व्यक्ति को धरती पर दृश्यमान वस्तुएं प्राप्त होती हैं एवं सूर्यादि लोक समृद्ध होते हैं. दाता जरामरण-रहित दीर्घ आयु प्राप्त करके अमर बनता है. (६)
The donor receives visible objects on the earth and the sun-adi folk are rich. The donor becomes immortal by attaining a long lifespan without germination. (6)
ऋग्वेद (मंडल 1)
मा पृ॒णन्तो॒ दुरि॑त॒मेन॒ आर॒न्मा जा॑रिषुः सू॒रयः॑ सुव्र॒तासः॑ । अ॒न्यस्तेषां॑ परि॒धिर॑स्तु॒ कश्चि॒दपृ॑णन्तम॒भि सं य॑न्तु॒ शोकाः॑ ॥ (७)
हवि द्वारा देवों को प्रसन्न करने वाला दुःख और पापों से दूर रहता है एवं स्तोता विद्वान् वृद्धावस्था से दूर रहते हैं. इन दोनों से भिन्न अर्थात् दान एवं स्तुति न करने वालों को पाप और शोक प्राप्त होता है. (७)
The one who pleases the gods by the havi stays away from sorrow and sins and the stotha scholars stay away from old age. Unlike these two, those who do not give charity and praise receive sin and sorrow. (7)