ऋग्वेद (मंडल 1)
यजि॑ष्ठं त्वा॒ यज॑माना हुवेम॒ ज्येष्ठ॒मङ्गि॑रसां विप्र॒ मन्म॑भि॒र्विप्रे॑भिः शुक्र॒ मन्म॑भिः । परि॑ज्मानमिव॒ द्यां होता॑रं चर्षणी॒नाम् । शो॒चिष्के॑शं॒ वृष॑णं॒ यमि॒मा विशः॒ प्राव॑न्तु जू॒तये॒ विशः॑ ॥ (२)
हे मेधावी एवं दीप्त ज्वालायुक्त अग्नि! हम यजमान मनुष्यों पर कृपा करने के हेतु मनन-साधन एवं प्रसन्नतादायक मंत्रों द्वारा अंगिराओं में श्रेष्ठ एवं यजन योग्य तुम्हें बुलाते हैं. तुम सब ओर चलने वाले सूर्य के समान देवों को बुलाते हो. तुम्हारी लपटें केशों के समान विस्तृत हैं. यजमान लोग वांछित फल पाने के लिए तुम्हें प्रसन्न करें. तुम वर्षाकारक हो. (२)
O bright and bright flames! We call you the best and the yajan-worthy of the angiras by means of meditation and pleasing mantras to have mercy on the host. You call upon the gods like the sun that runs all over. Your flames are as wide as the hair. Let the host people please you to get the desired fruit. You are a rainfeder. (2)