हरि ॐ

ऋग्वेद (Rigved)

ऋग्वेद 1.128.2

मंडल 1 → सूक्त 128 → श्लोक 2 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

ऋग्वेद (मंडल 1)

ऋग्वेद: | सूक्त: 128
तं य॑ज्ञ॒साध॒मपि॑ वातयामस्यृ॒तस्य॑ प॒था नम॑सा ह॒विष्म॑ता दे॒वता॑ता ह॒विष्म॑ता । स न॑ ऊ॒र्जामु॒पाभृ॑त्य॒या कृ॒पा न जू॑र्यति । यं मा॑त॒रिश्वा॒ मन॑वे परा॒वतो॑ दे॒वं भाः प॑रा॒वतः॑ ॥ (२)
हमारा स्तोत्र यज्ञ और घृत से युक्त तथा नम्रतासंपन्न है. हम इस स्तोत्र द्वारा अग्नि की तब तक सेवा करते हैं, जब तक वे संतुष्ट न हो जावें. अग्नि हव्यसंपन्न देवयज्ञ को पूर्ण करने में सहायता करते हैं. हमारे हव्य को स्वीकार करने से अग्नि का नाश नहीं होगा. जिस प्रकार मातरिश्वा मनु के निमित्त अग्नि को दूर से लाए और उसे जलाया, उसी प्रकार अग्नि दूर देश से हमारे यज्ञ में आवें. (२)
Our hymn is full of yajna and ghrit and full of humility. We serve the fire through this hymn until they are satisfied. Fire helps in completing the divine offering. Accepting our word will not destroy the fire. Just as Matrishva brought the fire for Manu's sake from afar and burned it, so should the fire come into our yajna from a distant land. (2)