ऋग्वेद (मंडल 1)
अ॒स्माकं॑ व॒ इन्द्र॑मुश्मसी॒ष्टये॒ सखा॑यं वि॒श्वायुं॑ प्रा॒सहं॒ युजं॒ वाजे॑षु प्रा॒सहं॒ युज॑म् । अ॒स्माकं॒ ब्रह्मो॒तयेऽवा॑ पृ॒त्सुषु॒ कासु॑ चित् । न॒हि त्वा॒ शत्रुः॒ स्तर॑ते स्तृ॒णोषि॒ यं विश्वं॒ शत्रुं॑ स्तृ॒णोषि॒ यम् ॥ (४)
हे ऋत्विजो! हम अपने यज्ञ में अपने मित्र, समस्त य॒ज्ञों में पहुंचने वाले, शत्रुनाशक, अपने सहायक, यज्ञ में विघ्न डालने वालों को पराजित करने वाले एवं मरुद्गणों के साथ रहने वाले इंद्र को चाहते हैं. हे इंद्र! हमारी रक्षा के लिए हमारे यज्ञ का पालन करो. युद्भक्षेत्र में तुम सभी शत्रुओं का संहार करते हो. कोई भी शत्रु तुम्हारा सामना नहीं करता. (४)
Hey Ritvijo! We want Indra, who has reached out to our friends, to all the yajnas, to the enemies, to our helpers, to defeat those who disrupt the yajna, and to live with the deserts. O Indra! Follow our yajna to protect us. In the battlefield you kill all the enemies. No enemy faces you. (4)