ऋग्वेद (मंडल 1)
वि श्र॑यन्तामृता॒वृधो॒ द्वारो॑ दे॒वीर॑स॒श्चतः॑ । अ॒द्या नू॒नं च॒ यष्ट॑वे ॥ (६)
यज्ञ पूरा करने के लिए आज निश्चय ही तेजस्वी एवं जनरहित द्वार खोले जावें. वे बंद न रहें. (६)
To complete the yajna, today must be opened the bright and peopleless doors. Don't let them shut down. (6)