हरि ॐ

ऋग्वेद (Rigved)

ऋग्वेद 1.130.4

मंडल 1 → सूक्त 130 → श्लोक 4 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

ऋग्वेद (मंडल 1)

ऋग्वेद: | सूक्त: 130
दा॒दृ॒हा॒णो वज्र॒मिन्द्रो॒ गभ॑स्त्योः॒ क्षद्मे॑व ति॒ग्ममस॑नाय॒ सं श्य॑दहि॒हत्या॑य॒ सं श्य॑त् । सं॒वि॒व्या॒न ओज॑सा॒ शवो॑भिरिन्द्र म॒ज्मना॑ । तष्टे॑व वृ॒क्षं व॒निनो॒ नि वृ॑श्चसि पर॒श्वेव॒ नि वृ॑श्चसि ॥ (४)
इंद्र अपने हाथों में वज्र को दृढ़ता से धारण किए हैं. वज्र तेज है. जैसे मंत्रों की सहायता से जल को प्रभावशाली बनाया जाता है, उसी प्रकार शत्रु पर चलाने के लिए वज्र को और भी तेज किया जाता है. हे इंद्र! जैसे बढ़ई कुल्हाड़ी से वन के वृक्षों को काटता है, उसी प्रकार तुम अपने तेज, शरीर, बल एवं शक्ति से बुद्धि प्राप्त करके हमारे शत्रुओं को छिन्न करते हो. (४)
Indra is firmly holding the vajra in his hands. The thunderbolt is fast. Just as water is made effective with the help of mantras, so the thunderbolt is intensified to run on the enemy. O Indra! Just as a carpenter cuts down the trees of the forest with an axe, so you snatch away our enemies by gaining wisdom with your speed, body, strength and power. (4)