हरि ॐ

ऋग्वेद (Rigved)

ऋग्वेद 1.130.6

मंडल 1 → सूक्त 130 → श्लोक 6 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

ऋग्वेद (मंडल 1)

ऋग्वेद: | सूक्त: 130
इ॒मां ते॒ वाचं॑ वसू॒यन्त॑ आ॒यवो॒ रथं॒ न धीरः॒ स्वपा॑ अतक्षिषुः सु॒म्नाय॒ त्वाम॑तक्षिषुः । शु॒म्भन्तो॒ जेन्यं॑ यथा॒ वाजे॑षु विप्र वा॒जिन॑म् । अत्य॑मिव॒ शव॑से सा॒तये॒ धना॒ विश्वा॒ धना॑नि सा॒तये॑ ॥ (६)
हे इंद्र! जिस प्रकार शोभन कर्म वाले धीर मनुष्य रथ का निर्माण करते हैं, उसी प्रकार हम यजमानों ने धन प्राप्ति की इच्छा से तुम्हारी स्तुति बनाई है एवं अपनी सुख प्राप्ति के लिए तुम्हें प्रसन्न कर लिया है. जिस प्रकार योद्धा विजयी की प्रशंसा करते हैं, उसी प्रकार हे मेधासंपन्न इंद्र! तुम्हारी प्रशंसा की जा रही है. जैसे युद्ध के समय जयशील अश्च प्रशंसित होता है, उसी प्रकार बल, धन की रक्षा एवं समस्त कल्याण पाने के लिए तुम्हारी प्रशंसा हो रही है. (६)
O Indra! Just as the patient people of shobhan karma build the chariot, so we hosts have made you praise by the desire to gain wealth and have made you happy for our happiness. Just as the warriors praise the victorious, so do O Rainbow! You are being praised. Just as the glorious assh is admired in the time of war, so you are being praised for protecting strength, money and getting all the welfare. (6)