हरि ॐ

ऋग्वेद (Rigved)

ऋग्वेद 1.130.9

मंडल 1 → सूक्त 130 → श्लोक 9 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

ऋग्वेद (मंडल 1)

ऋग्वेद: | सूक्त: 130
सूर॑श्च॒क्रं प्र वृ॑हज्जा॒त ओज॑सा प्रपि॒त्वे वाच॑मरु॒णो मु॑षायतीशा॒न आ मु॑षायति । उ॒शना॒ यत्प॑रा॒वतोऽज॑गन्नू॒तये॑ कवे । सु॒म्नानि॒ विश्वा॒ मनु॑षेव तु॒र्वणि॒रहा॒ विश्वे॑व तु॒र्वणिः॑ ॥ (९)
ये इंद्र सूर्य के रथ का पहिया हाथ में उठाकर अत्यंत बलसंपन्न हो उठे और उसे विरोधियों पर फैका. इंद्र परम तेजस्वी अरुण रूप बनाकर शत्रुओं के समीप पहुंचे और उनके प्राणों का हरण कर लिया. इंद्र ने अंधकार निवारण के लिए चक्र चलाया था. हे क्रांतदर्शी इंद्र! जिस प्रकार तुम उशना की रक्षा के लिए दूर स्वर्ग से आए थे, उसी प्रकार हमारे समस्त सुखों का साधन रूप धन लेकर शीघ्र ही हमारे समीप आओ. तुम जिस तरह दूसरे यजमानों के लिए समस्त धन लेकर आते हो, उसी प्रकार हमारे लिए भी लाओ. (९)
These Indras lifted the wheel of the Sun's chariot in their hands and became extremely forceful and threw it at the opponents. Indra came close to the enemies by making the most brilliant Arun form and took away their lives. Indra had run the chakra to remove the darkness. O revolutionary Indra! Just as you came from far away heaven to protect Ushna, so come to us soon with money as a means of all our happiness. Just as you bring all the money for other hosts, so do you bring it for us. (9)