हरि ॐ

ऋग्वेद (Rigved)

ऋग्वेद 1.132.2

मंडल 1 → सूक्त 132 → श्लोक 2 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

ऋग्वेद (मंडल 1)

ऋग्वेद: | सूक्त: 132
स्व॒र्जे॒षे भर॑ आ॒प्रस्य॒ वक्म॑न्युष॒र्बुधः॒ स्वस्मि॒न्नञ्ज॑सि क्रा॒णस्य॒ स्वस्मि॒न्नञ्ज॑सि । अह॒न्निन्द्रो॒ यथा॑ वि॒दे शी॒र्ष्णाशी॑र्ष्णोप॒वाच्यः॑ । अ॒स्म॒त्रा ते॑ स॒ध्र्य॑क्सन्तु रा॒तयो॑ भ॒द्रा भ॒द्रस्य॑ रा॒तयः॑ ॥ (२)
जो वीर पुरुष युद्ध में मारे जाते हैं, उन्हें इन्द्र स्वर्ग देते हैं. युद्ध स्वर्ग प्राप्ति का निष्कपट मार्ग है. इंद्र ऐसे युद्ध के आगे रहते हैं एवं जो यज्ञकर्ता प्रातःकाल जागते हैं, उनके शत्रुओं का विनाश करते हैं. जैसे सर्वज्ञ व्यक्तियों को सिर झुका कर प्रणाम करते हैं, उसी प्रकार इंद्र को भी करना चाहिए. हे भद्र इंद्र! तुम्हारा दिया हुआ धन हमारे लिए हो एवं स्थिर हो. (२)
Those brave men who are killed in war, Indra gives them heaven. War is the sincere way to heaven. Indra lives in front of such a war and the yagyakars who wake up in the morning destroy their enemies. Just as omniscient people bow their heads, so should Indra. O Bhadra Indra! May the money you give us be for us and be stable. (2)