ऋग्वेद (मंडल 1)
यु॒वं तमि॑न्द्रापर्वता पुरो॒युधा॒ यो नः॑ पृत॒न्यादप॒ तंत॒मिद्ध॑तं॒ वज्रे॑ण॒ तंत॒मिद्ध॑तम् । दू॒रे च॒त्ताय॑ च्छन्त्स॒द्गह॑नं॒ यदिन॑क्षत् । अ॒स्माकं॒ शत्रू॒न्परि॑ शूर वि॒श्वतो॑ द॒र्मा द॑र्षीष्ट वि॒श्वतः॑ ॥ (६)
हे इंद्र एवं मेघ! हमारे जो विरोधी शत्रु सेना एकत्र करते हैं, तुम दोनों हमारे आगे चलकर वज्रप्रहार द्वारा उनका ध्वंस करो. तुम्हारा वज्र दूरवर्ती शत्रु को भी नष्ट करना चाहता है और दुर्गम स्थानों में भी पहुंच जाता है. हे शूर! हमारे शत्रुओं को विविध उपायों से विदीर्ण करो. तुम्हारा वज्र शत्रुओं को समस्त उपायों से नष्ट करता है. (६)
O Indra and Megh! Both of you who gather our hostile armies, go before us and destroy them by thunderbolt. Your thunderbolt also wants to destroy the distant enemy and reaches difficult places. Oh, Shur! Dispel our enemies by various means. Your thunderbolt destroys enemies by all means. (6)