ऋग्वेद (मंडल 1)
अत्राह॒ तद्व॑हेथे॒ मध्व॒ आहु॑तिं॒ यम॑श्व॒त्थमु॑प॒तिष्ठ॑न्त जा॒यवो॒ऽस्मे ते स॑न्तु जा॒यवः॑ । सा॒कं गावः॒ सुव॑ते॒ पच्य॑ते॒ यवो॒ न ते॑ वाय॒ उप॑ दस्यन्ति धे॒नवो॒ नाप॑ दस्यन्ति धे॒नवः॑ ॥ (८)
हे इंद्र और वायु! तुम हमारे यज्ञ में मधु के समान आहुति को स्वीकार करो. सोम को प्राप्त करने के लिए विजयी यजमान पर्वतीय प्रदेशों में जाते हैं. हमारे ऋत्विज् तुम्हारा यज्ञकर्म करने में समर्थ हों. इस यज्ञ में बहुत सी गाएं तुम्हारे निमित्त एक साथ बहुत सा दूध देती हैं एवं पुरोडाश पकाया जाता है. ये गाएं न कम हों और न दुबली हों. (८)
O Indra and Vayu! You accept the sacrifice like honey in our yajna. The victorious hosts go to the mountainous regions to obtain Soma. May our Ritvijs be able to perform your Yagyakarma. In this yajna, many cows give a lot of milk for you together and Purodash is cooked. These cattle should neither be deficient nor be thin. (8)