हरि ॐ

ऋग्वेद (Rigved)

ऋग्वेद (मंडल 1)

ऋग्वेद: | सूक्त: 139
अस्तु॒ श्रौष॑ट् पु॒रो अ॒ग्निं धि॒या द॑ध॒ आ नु तच्छर्धो॑ दि॒व्यं वृ॑णीमह इन्द्रवा॒यू वृ॑णीमहे । यद्ध॑ क्रा॒णा वि॒वस्व॑ति॒ नाभा॑ सं॒दायि॒ नव्य॑सी । अध॒ प्र सू न॒ उप॑ यन्तु धी॒तयो॑ दे॒वाँ अच्छा॒ न धी॒तयः॑ ॥ (१)
मैंने उत्तरी वेदी में श्रद्धापूर्वक अग्नि को धारण किया है. मैं अग्नि की दिव्य शक्ति की एवं इंद्र व वायु की सम्मुख होकर प्रार्थना करता हूं. पृथ्वी की प्रकाशित नाभि अर्थात्‌ यज्ञभूमि को लक्ष्य करके यह स्वार्थ प्रकाशन करती हुई नई स्तुति बनाई गई है, इसलिए वह सुनी जावे. हमारे स्तुतिरूपी कर्म देवों के समीप पहुंचें. (१)
I have reverentially held the fire in the northern altar. I pray in front of the divine power of fire and indra and vayu. By targeting the illuminated navel of the earth i.e. the sacrificial land, a new praise has been created by publishing this selfishness, so that it should be heard. Let our praiseworthy deeds come to the gods. (1)

ऋग्वेद (मंडल 1)

ऋग्वेद: | सूक्त: 139
यद्ध॒ त्यन्मि॑त्रावरुणावृ॒तादध्या॑द॒दाथे॒ अनृ॑तं॒ स्वेन॑ म॒न्युना॒ दक्ष॑स्य॒ स्वेन॑ म॒न्युना॑ । यु॒वोरि॒त्थाधि॒ सद्म॒स्वप॑श्याम हिर॒ण्यय॑म् । धी॒भिश्च॒न मन॑सा॒ स्वेभि॑र॒क्षभिः॒ सोम॑स्य॒ स्वेभि॑र॒क्षभिः॑ ॥ (२)
हे मित्र एवं वरुण! तुम अपने तेज से जो सूखने वाला जल आदित्य से भली प्रकार ग्रहण करते हो, वही हमें सब ओर से देते हो. हम यज्ञादि रूपी कर्मो द्वारा, सोमरस द्वारा तथा ज्ञान में आसक्त इंट्रियों द्वारा तुम दोनों का हिरणमय रूप देखें. (२)
Oh my friend and Varun! The water that you receive well from Aditya, which you receive from aditya with your fast, you give us from all sides. We see the deer form of both of you by performing yajnaadi, by somras and by intrusive intrices in knowledge. (2)

ऋग्वेद (मंडल 1)

ऋग्वेद: | सूक्त: 139
यु॒वां स्तोमे॑भिर्देव॒यन्तो॑ अश्विनाश्रा॒वय॑न्त इव॒ श्लोक॑मा॒यवो॑ यु॒वां ह॒व्याभ्या॒३॒॑यवः॑ । यु॒वोर्विश्वा॒ अधि॒ श्रियः॒ पृक्ष॑श्च विश्ववेदसा । प्रु॒षा॒यन्ते॑ वां प॒वयो॑ हिर॒ण्यये॒ रथे॑ दस्रा हिर॒ण्यये॑ ॥ (३)
हे अश्चिनीकुमारो! स्तुतियों द्वारा तुम्हें अपने अनुकूल बनाने की इच्छा करने वाले यजमान तुम्हें सुनाते हुए श्लोक बोलते हैं. हे समस्त धनों के स्वामियो! वे तुम्हारी अनुकंपा से सभी संपत्तियां एवं अन्न प्राप्त करते हैं. हे शन्रुनाशको! तुम्हारे स्वर्णमय रथ की नेमियों से मधु टपकता है. तुम उसी रथ पर मधुर हवि धारण करो. (३)
O aschinikumaro! Hosts who wish to adapt you to themselves through praises speak verses while reciting to you. O lords of all wealth! They get all the possessions and food from your compassion. Oh, hey, the disciples! Honey drips from the names of your golden chariot. You put the sweet ness on the same chariot. (3)

ऋग्वेद (मंडल 1)

ऋग्वेद: | सूक्त: 139
अचे॑ति दस्रा॒ व्यु१॒॑ नाक॑मृण्वथो यु॒ञ्जते॑ वां रथ॒युजो॒ दिवि॑ष्टिष्वध्व॒स्मानो॒ दिवि॑ष्टिषु । अधि॑ वां॒ स्थाम॑ व॒न्धुरे॒ रथे॑ दस्रा हिर॒ण्यये॑ । प॒थेव॒ यन्ता॑वनु॒शास॑ता॒ रजोऽञ्ज॑सा॒ शास॑ता॒ रजः॑ ॥ (४)
हे शत्रुनाशको! तुम्हारे इन कार्यो को लोग भली प्रकार जानते हैं. तुम स्वर्ग को जाते हो, इसलिए तुम्हारे रथचालक तुम्हे स्वर्ग के मार्गरूप यज्ञों में ले जाने को रथ तैयार करते हैं एवं मार्ग के अभाव में भी रथ को नष्ट नहीं करते. हम तीन बंधनों वाले स्वर्णरथ पर सुंदर मार्ग से स्वर्ग को जाने वाले, शत्रुओं को वश में करने वाले एवं मुख्य रूप से वर्षा का जल बिखेरने वाले तुमको बैठाते हैं. (४)
O enemies! People know these things of yours very well. You go to heaven, so your chariot drivers prepare chariots to take you to the yagnas as the way to heaven and do not destroy the chariot even in the absence of a path. We sit on the golden chariot of the three bonds, those who go to heaven by the beautiful path, subdue the enemies and mainly scatter the rain water. (4)

ऋग्वेद (मंडल 1)

ऋग्वेद: | सूक्त: 139
शची॑भिर्नः शचीवसू॒ दिवा॒ नक्तं॑ दशस्यतम् । मा वां॑ रा॒तिरुप॑ दस॒त्कदा॑ च॒नास्मद्रा॒तिः कदा॑ च॒न ॥ (५)
हे कर्मरूप धन के स्वामियो! हमारे यज्ञादि कर्म द्वारा हमें रात-दिन मनचाही वस्तुएं दो. तुम्हारा एवं हमारा दान कभी भी समाप्त न हो. (५)
O masters of karmaroop money! Give us the things we want day and night through our sacrificial deeds. Your donation and yours will never end. (5)

ऋग्वेद (मंडल 1)

ऋग्वेद: | सूक्त: 139
वृष॑न्निन्द्र वृष॒पाणा॑स॒ इन्द॑व इ॒मे सु॒ता अद्रि॑षुतास उ॒द्भिद॒स्तुभ्यं॑ सु॒तास॑ उ॒द्भिदः॑ । ते त्वा॑ मन्दन्तु दा॒वने॑ म॒हे चि॒त्राय॒ राध॑से । गी॒र्भिर्गि॑र्वाहः॒ स्तव॑मान॒ आ ग॑हि सुमृळी॒को न॒ आ ग॑हि ॥ (६)
हे कामवर्षक इंद्र! पाषाण खंडों द्वारा कुचलकर निचोड़ा गया यह सोम तुम्हारे पीने के लिए ही तैयार किया गया है. पर्वत पर उत्पन्न होने वाला सोम तुम्हारे निमित्त निचोड़ा गया है. अभिमतदान, महान्‌ एवं विचित्र धन प्राप्ति के लिए दिया गया सोम तुम्हें प्रसन्न करे. हे स्तुतिधारक! हमारी स्तुतियां सुनकर हमारे ऊपर प्रसन्न होते हुए आओ. (६)
O workman Indra! Crushed by the stone segments this mon has been prepared for your drinking only. The mon originating on the mountain has been squeezed for you. May the gift of opinion, given for the attainment of great and strange wealth please you. O you of praise! Come, delighting us to hear our praises. (6)

ऋग्वेद (मंडल 1)

ऋग्वेद: | सूक्त: 139
ओ षू णो॑ अग्ने श‍ृणुहि॒ त्वमी॑ळि॒तो दे॒वेभ्यो॑ ब्रवसि य॒ज्ञिये॑भ्यो॒ राज॑भ्यो य॒ज्ञिये॑भ्यः । यद्ध॒ त्यामङ्गि॑रोभ्यो धे॒नुं दे॑वा॒ अद॑त्तन । वि तां दु॑ह्रे अर्य॒मा क॒र्तरी॒ सचा॑ँ ए॒ष तां वे॑द मे॒ सचा॑ ॥ (७)
हे अग्नि! तुम हमारे द्वारा स्तुत होकर हमारा आह्वान सुनो. तुम यज्ञ के योग्य एवं तेजस्वी देवों को यजमान के यज्ञकर्मो की सूचना देना. देवों ने अंगिरागोत्रीय ऋषियों को प्रसिद्ध गाय दी थी. अर्यमा ने अन्य देवों के साथ अग्नि के लिए उस गाय को दुहा. वे अर्यमा उस गाय को तथा मुझे जानते हैं. (७)
O fire! You are praised by us and listen to our call. You inform the worthy and bright gods of the yajnakaras of the host. The devas had given the famous cow to the Angiragotrian sages. Aryama milked that cow for fire along with other gods. They know that cow and me. (7)

ऋग्वेद (मंडल 1)

ऋग्वेद: | सूक्त: 139
मो षु वो॑ अ॒स्मद॒भि तानि॒ पौंस्या॒ सना॑ भूवन्द्यु॒म्नानि॒ मोत जा॑रिषुर॒स्मत्पु॒रोत जा॑रिषुः । यद्व॑श्चि॒त्रं यु॒गेयु॑गे॒ नव्यं॒ घोषा॒दम॑र्त्यम् । अ॒स्मासु॒ तन्म॑रुतो॒ यच्च॑ दु॒ष्टरं॑ दिधृ॒ता यच्च॑ दु॒ष्टर॑म् ॥ (८)
हे मरुतो! तुम्हारी प्रसिद्ध, नित्य एवं प्रकाशयुक्त शक्ति हमसे कभी दूर न जाए. हमारा यश एवं हमारे नगर जीर्ण न हों. तुम्हारी विचित्र, नवीन एवं शब्द करने वाली वस्तुएं हमें युग- युग में प्राप्त हों. दुःख से प्राप्त करने योग्य एवं शत्रुओं द्वारा नष्ट न होने वाला जो धन है, वह हमारा हो. (८)
O Maruto! Your famous, regular and light-filled power will never go away from us. Let our glory and our cities not be dilapidated. May we receive your strange, new and word-making things in the ages. The wealth that is worthy of suffering and not destroyed by enemies, is ours. (8)
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