ऋग्वेद (मंडल 1)
आद॑स्य॒ ते ध्व॒सय॑न्तो॒ वृथे॑रते कृ॒ष्णमभ्वं॒ महि॒ वर्पः॒ करि॑क्रतः । यत्सीं॑ म॒हीम॒वनिं॒ प्राभि मर्मृ॑शदभिश्व॒सन्स्त॒नय॒न्नेति॒ नान॑दत् ॥ (५)
जिस प्रकार अग्नि सब ओर चेष्टा और शब्द करते हुए तथा अत्यंत गरजते हुए महती भूमि का बार-बार स्पर्श करते हैं, उस समय इनकी चिनगारियां अंधकार का विनाश करती हुई एवं काले रंग के गमन मार्ग को प्रकाश से भरती हुई सब ओर जाती हैं. (५)
Just as the fire touches the great land repeatedly, making gestures and words all around and with the most thundering, at that time their sparks go all the way, destroying the darkness and filling the dark path with light. (5)