ऋग्वेद (मंडल 1)
आ भन्द॑माने॒ उपा॑के॒ नक्तो॒षासा॑ सु॒पेश॑सा । य॒ह्वी ऋ॒तस्य॑ मा॒तरा॒ सीद॑तां ब॒र्हिरा सु॒मत् ॥ (७)
सबके द्वारा स्तुत, परस्पर संनिहित, शोभन, महान् यज्ञ के माता-पिता के समान निशा एवं उषा स्वयं ही आकर फैले हुए कुशों पर बैठे. (७)
As the parents of the great yagna, Nisha and Usha themselves came and sat on the stretched kushas, as appreciated, mutually embedded, adorned by everyone. (7)