हरि ॐ

ऋग्वेद (Rigved)

ऋग्वेद 1.148.2

मंडल 1 → सूक्त 148 → श्लोक 2 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

ऋग्वेद (मंडल 1)

ऋग्वेद: | सूक्त: 148
द॒दा॒नमिन्न द॑दभन्त॒ मन्मा॒ग्निर्वरू॑थं॒ मम॒ तस्य॑ चाकन् । जु॒षन्त॒ विश्वा॑न्यस्य॒ कर्मोप॑स्तुतिं॒ भर॑माणस्य का॒रोः ॥ (२)
अग्नि को उत्तम हव्य या स्तुति देने वाले मुझको शत्रु नष्ट नहीं कर सकते. अग्नि मेरे उत्तम स्तोत्र की कामना करते हैं. स्तुति करने वाले यजमान द्वारा दिए गए हव्य स्वीकार करते हैं. (२)
Enemies can not destroy me, who give the best of havya or praise to agni. Agni wish me the best hymn and accept the words given by the yajman. (2)