हरि ॐ

ऋग्वेद (Rigved)

ऋग्वेद 1.148.5

मंडल 1 → सूक्त 148 → श्लोक 5 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

ऋग्वेद (मंडल 1)

ऋग्वेद: | सूक्त: 148
न यं रि॒पवो॒ न रि॑ष॒ण्यवो॒ गर्भे॒ सन्तं॑ रेष॒णा रे॒षय॑न्ति । अ॒न्धा अ॑प॒श्या न द॑भन्नभि॒ख्या नित्या॑स ईं प्रे॒तारो॑ अरक्षन् ॥ (५)
अरणि के मध्य में वर्तमान जिसको शत्रु दु:ख नहीं दे सकते, अंधा व्यक्ति भी उस अग्नि के महत्त्व को नष्ट नहीं कर सकता. अविचलभक्ति वाले यजमान यज्ञादि द्वारा उसी अग्नि को वृप्त करते एवं उसकी रक्षा करते हैं. (५)
In the midst of the arani, the present to whom the enemies cannot give sorrow, the blind person cannot destroy the importance of that fire. Hosts with unconvincing devotions kill and protect the same fire through yajnaadi. (5)