हरि ॐ

ऋग्वेद (Rigved)

ऋग्वेद 1.153.4

मंडल 1 → सूक्त 153 → श्लोक 4 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

ऋग्वेद (मंडल 1)

ऋग्वेद: | सूक्त: 153
उ॒त वां॑ वि॒क्षु मद्या॒स्वन्धो॒ गाव॒ आप॑श्च पीपयन्त दे॒वीः । उ॒तो नो॑ अ॒स्य पू॒र्व्यः पति॒र्दन्वी॒तं पा॒तं पय॑स उ॒स्रिया॑याः ॥ (४)
हे मित्र और वरुण! अन्न, दिव्य गाएं एवं जल तुम्हारी कृपा प्राप्त करने वाले यजमानों को प्रसन्न करें. हमारे यजमान के पूर्वकालीन पालक अग्नि दाता हों. तुम दोनों दुधारू गाय का दूध पिओ. (४)
Hey friend and Varun! May food, divine sings and water please the hosts who receive your grace. The erstwhile guardians of our host should be fire donors. You both drink milk from the milch cow. (4)