ऋग्वेद (मंडल 1)
तमु॑ स्तोतारः पू॒र्व्यं यथा॑ वि॒द ऋ॒तस्य॒ गर्भं॑ ज॒नुषा॑ पिपर्तन । आस्य॑ जा॒नन्तो॒ नाम॑ चिद्विवक्तन म॒हस्ते॑ विष्णो सुम॒तिं भ॑जामहे ॥ (३)
हे स्तोताओ! प्राचीन एवं यज्ञ के गर्भ रूप विष्णु को तुम जैसा जानते हो, उन्हें उसी प्रकार स्वयं प्रसन्न करो एवं उनका नाम जानकर भली-भांति कीर्तन करो. हे महान् विष्णु! हम तुम्हारी स्तुति की सेवा करते हैं. (३)
This stotao! Please the ancient and the mother of the yagna, Vishnu as you know him, in the same way as you know him, and know his name and do kirtan well. O great Vishnu! We serve your praise. (3)