ऋग्वेद (मंडल 1)
ते हि द्यावा॑पृथि॒वी वि॒श्वश॑म्भुव ऋ॒ताव॑री॒ रज॑सो धार॒यत्क॑वी । सु॒जन्म॑नी धि॒षणे॑ अ॒न्तरी॑यते दे॒वो दे॒वी धर्म॑णा॒ सूर्यः॒ शुचिः॑ ॥ (१)
शुद्ध एवं दीप्यमान सूर्य समस्त प्राणियों को सुख देने वाले, यज्ञसंपन्न, जल उत्पादन के प्रयत्नों सहित, शोभनजन्म वाले एवं अपने कार्यकुशल धरती और आकाश के बीच में अपनी विशेषताओं की रक्षा करता हुआ सदा गमन करता है. (१)
The pure and radiant sun always moves between the earth and the sky, giving pleasure to all beings, sacrificial, with efforts to produce water, adorned and efficient by its efficient, protecting its features between the earth and the sky. (1)
ऋग्वेद (मंडल 1)
उ॒रु॒व्यच॑सा म॒हिनी॑ अस॒श्चता॑ पि॒ता मा॒ता च॒ भुव॑नानि रक्षतः । सु॒धृष्ट॑मे वपु॒ष्ये॒३॒॑ न रोद॑सी पि॒ता यत्सी॑म॒भि रू॒पैरवा॑सयत् ॥ (२)
विस्तीर्ण, महान् एवं एक-दूसरे से अलग, माता एवं पितारूप धरती-आकाश समस्त प्राणियों की रक्षा करते हैं. अत्यंत शक्तिसंपन्न धरती-आकाश शरीरधारियों के हित के लिए चेष्टा करते हैं एवं माता-पिता के समान सबको रूपनिर्माण से अनुगृहीत करते हैं. (२)
Vast, great and different from each other, mother and fatherly earth-sky protect all beings. The very powerful earth and the sky strive for the benefit of the body-holders and like the parents, they take care of everyone as a form. (2)
ऋग्वेद (मंडल 1)
स वह्निः॑ पु॒त्रः पि॒त्रोः प॒वित्र॑वान्पु॒नाति॒ धीरो॒ भुव॑नानि मा॒यया॑ । धे॒नुं च॒ पृश्निं॑ वृष॒भं सु॒रेत॑सं वि॒श्वाहा॑ शु॒क्रं पयो॑ अस्य दुक्षत ॥ (३)
पावन, रश्मियुक्त, धीर, फल धारण करने वाले एवं अपनी बुद्धि से समस्त प्राणियों को पवित्र करने वाले सूर्य माता-पिता तुल्य धरती और आकाश के पुत्र हैं. वे धरतीरूपी शुक्लवर्ण धेनु और आकाशरूपी सामर्थ्यसंपन्न बैल को प्रकाशित करते हैं एवं आकाश से उज्ज्वल दूध दुहते हैं. (३)
The sun, who is pure, rashmi- friendly, patient, bear fruit and sanctifies all beings with his wisdom, are the sons of the earth and the sky like the parents. They illuminate the earthly Shuklavarna Dhenu and the sky-like powerful bull and milk the bright milk from the sky. (3)
ऋग्वेद (मंडल 1)
अ॒यं दे॒वाना॑म॒पसा॑म॒पस्त॑मो॒ यो ज॒जान॒ रोद॑सी वि॒श्वश॑म्भुवा । वि यो म॒मे रज॑सी सुक्रतू॒यया॒जरे॑भिः॒ स्कम्भ॑नेभिः॒ समा॑नृचे ॥ (४)
वे सूर्य देवों एवं कर्मकर्तताओं में अत्यंत श्रेष्ठ हैं. उन्होंने प्राणियों को सभी प्रकार से सुख देने वाले धरती और आकाश को उत्पन्न एवं शोभन कर्म की इच्छा से दोनों को विभक्त करके मजबूत खूंटों द्वारा स्थिर किया है. (४)
They are the best of sun gods and deeds. He has stabilized the earth and the sky, which give all kinds of pleasures to the beings, by dividing them both by the desire of creation and adornment karma, by strong pegs. (4)
ऋग्वेद (मंडल 1)
ते नो॑ गृणा॒ने म॑हिनी॒ महि॒ श्रवः॑ क्ष॒त्रं द्या॑वापृथिवी धासथो बृ॒हत् । येना॒भि कृ॒ष्टीस्त॒तना॑म वि॒श्वहा॑ प॒नाय्य॒मोजो॑ अ॒स्मे समि॑न्वतम् ॥ (५)
हमारे द्वारा जिन धरती और आकाश की स्तुति की जाती है, वे महान् हैं एवं हमें सर्वत्र प्रसिद्ध अन्न और यश देते हैं. इन्हीं के बल पर हमने पुत्र आदि प्रजाओं का विस्तार किया है. तुम हमें प्रशंसायोग्य शक्ति प्रदान करो. (५)
The earth and the sky that we praise are great and give us the famous food and glory everywhere. On the strength of these, we have expanded the sons, etc., to the people. You give us praiseworthy power. (5)