हरि ॐ

ऋग्वेद (Rigved)

ऋग्वेद 1.162.11

मंडल 1 → सूक्त 162 → श्लोक 11 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

ऋग्वेद (मंडल 1)

ऋग्वेद: | सूक्त: 162
यत्ते॒ गात्रा॑द॒ग्निना॑ प॒च्यमा॑नाद॒भि शूलं॒ निह॑तस्याव॒धाव॑ति । मा तद्भूम्या॒मा श्रि॑ष॒न्मा तृणे॑षु दे॒वेभ्य॒स्तदु॒शद्भ्यो॑ रा॒तम॑स्तु ॥ (११)
हे घोड़े! आग में पकाए जाते हुए तुम्हारे गात्र से जो रस छलकता है एवं तुम्हें मारते समय जो रक्त शूल में लग जाता है, वह न धरती पर गिरे और न तिनकों में मिले. संपूर्ण की कामना करने वाले देवों को वह दिया जाए. (११)
Oh, the horse! The juice that flows from your pot while being cooked in the fire, and the blood that goes into the colic when it kills you, should not fall to the ground, nor be found in the straws. It should be given to the gods who wish for the whole. (11)