हरि ॐ

ऋग्वेद (Rigved)

ऋग्वेद 1.162.2

मंडल 1 → सूक्त 162 → श्लोक 2 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

ऋग्वेद (मंडल 1)

ऋग्वेद: | सूक्त: 162
यन्नि॒र्णिजा॒ रेक्ण॑सा॒ प्रावृ॑तस्य रा॒तिं गृ॑भी॒तां मु॑ख॒तो नय॑न्ति । सुप्रा॑ङ॒जो मेम्य॑द्वि॒श्वरू॑प इन्द्रापू॒ष्णोः प्रि॒यमप्ये॑ति॒ पाथः॑ ॥ (२)
ऋत्विज्‌ रूपवान एवं सोने के आभूषणों से सजे हुए घोड़े के सामने भेंट करने के उद्देश्य से बकरे को ले जाते हैं. “में, में' करता हुआ अनेक रंग का बकरा इंद्र और पूषा का प्रिय है. वह अश्व के सामने आए. (२)
The ritwis take away the goat for the purpose of offering it to the horse dressed in the form of a silver and decorated with gold ornaments. The many-colored goat doing "in, in" is the beloved of Indra and Pusha. He came in front of the horse. (2)