हरि ॐ

ऋग्वेद (Rigved)

ऋग्वेद (मंडल 1)

ऋग्वेद: | सूक्त: 164
अ॒स्य वा॒मस्य॑ पलि॒तस्य॒ होतु॒स्तस्य॒ भ्राता॑ मध्य॒मो अ॒स्त्यश्नः॑ । तृ॒तीयो॒ भ्राता॑ घृ॒तपृ॑ष्ठो अ॒स्यात्रा॑पश्यं वि॒श्पतिं॑ स॒प्तपु॑त्रम् ॥ (१)
आरोग्य प्राप्ति के लिए सबके द्वारा सेवनीय व जगत्पालक सूर्य के बीच वाले भाई वायु हैं. इसके तीसरे भाई आहुति स्वीकार करने वाले अग्नि हैं. इन भाइयों के बीच में किरणरूपी सात पुत्रों सहित विश्वपति दिखाई देते हैं. (१)
The brothers between the sun, which are consumed by everyone and the world-sustaining sun, are the air for recovery. Its third brother is Agni to accept Ahuti. Among these brothers, the vishwapatis, including the seven sons of Kiran rupi, appear. (1)

ऋग्वेद (मंडल 1)

ऋग्वेद: | सूक्त: 164
स॒प्त यु॑ञ्जन्ति॒ रथ॒मेक॑चक्र॒मेको॒ अश्वो॑ वहति स॒प्तना॑मा । त्रि॒नाभि॑ च॒क्रम॒जर॑मन॒र्वं यत्रे॒मा विश्वा॒ भुव॒नाधि॑ त॒स्थुः ॥ (२)
सूर्य के एक पहिए वाले रथ में जुते हुए सात घोड़े ही उसको खींचते हैं. सात नामों वाला एक ही घोड़ा रथ को खींचता है. दृढ़ और नित्य नवीन तीन नाभियां उस पहिए में हैं. उस में सारा विश्व स्थित है. (२)
Seven horses plowed in the one wheeled chariot of the Sun pull it. A single horse with seven names pulls the chariot. Firm and ever new are the three navels in that wheel. In him the whole world is situated. (2)

ऋग्वेद (मंडल 1)

ऋग्वेद: | सूक्त: 164
इ॒मं रथ॒मधि॒ ये स॒प्त त॒स्थुः स॒प्तच॑क्रं स॒प्त व॑ह॒न्त्यश्वाः॑ । स॒प्त स्वसा॑रो अ॒भि सं न॑वन्ते॒ यत्र॒ गवां॒ निहि॑ता स॒प्त नाम॑ ॥ (३)
सात पहियों वाले रथ में जुते हुए सात घोड़े ही उसको खींचते हैं. सात किरण रूपी बहिनें इसके सामने चलती हैं एवं सात गाएं इस रथ में बैठी हैं. (३)
Only seven horses in a seven-wheeled chariot pull the Sun. Seven kiran-like sisters walk in front of it and seven cows are sitting in this chariot. (3)

ऋग्वेद (मंडल 1)

ऋग्वेद: | सूक्त: 164
को द॑दर्श प्रथ॒मं जाय॑मानमस्थ॒न्वन्तं॒ यद॑न॒स्था बिभ॑र्ति । भूम्या॒ असु॒रसृ॑गा॒त्मा क्व॑ स्वि॒त्को वि॒द्वांस॒मुप॑ गा॒त्प्रष्टु॑मे॒तत् ॥ (४)
जब अस्थिहीन प्रकृति ने अस्थि वाले संसार को धारण किया था, तब प्रथम उत्पन्न होने वाले को कौन देख सका था? प्राण और रक्त ने तो पृथ्वी से जन्म लिया, पर आत्मा कहां से आई? यह प्रश्न किसी जानकार से पूछने कौन जाएगा. (४)
When the boneless nature possessed the bone-like world, who could see the first one to be born? Life and blood were born from the earth, but where did the soul come from? Who will ask this question to someone knowledgeable? (4)

ऋग्वेद (मंडल 1)

ऋग्वेद: | सूक्त: 164
पाकः॑ पृच्छामि॒ मन॒सावि॑जानन्दे॒वाना॑मे॒ना निहि॑ता प॒दानि॑ । व॒त्से ब॒ष्कयेऽधि॑ स॒प्त तन्तू॒न्वि त॑त्निरे क॒वय॒ ओत॒वा उ॑ ॥ (५)
मैं अपरिपक्व बुद्धि वाला मन से न जानने के कारण यह सब पूछ रहा हूं. ये संदेहास्पद बातें देवों के लिए भी गूढ़ हैं. एक वर्ष के बछड़े को लपेटने के लिए मेधावियों ने जो सात धागे बताए हैं, वे क्या हैं? (५)
I'm asking all this because Immature-minded people don't know from the mind. These suspicious things are also esoteric to the gods. What are the seven threads that the meritorious have mentioned to wrap a one-year-old calf? (5)

ऋग्वेद (मंडल 1)

ऋग्वेद: | सूक्त: 164
अचि॑कित्वाञ्चिकि॒तुष॑श्चि॒दत्र॑ क॒वीन्पृ॑च्छामि वि॒द्मने॒ न वि॒द्वान् । वि यस्त॒स्तम्भ॒ षळि॒मा रजां॑स्य॒जस्य॑ रू॒पे किमपि॑ स्वि॒देक॑म् ॥ (६)
मैं अज्ञानी हूं, पर जानने की इच्छा रखता हूं, इसीलिए तत्त्वज्ञानी क्रांतदर्शियों से पूछ रहा हूं. जिसने इन छः लोकों को स्थिर किया है, जो जन्मरहित होकर रहते हैं, वे क्या एक हैं? (६)
I am ignorant, but I wish to know, that's why I am asking philosophers. What one is the one who has stabilized these six realms, who live without birth? (6)

ऋग्वेद (मंडल 1)

ऋग्वेद: | सूक्त: 164
इ॒ह ब्र॑वीतु॒ य ई॑म॒ङ्ग वेदा॒स्य वा॒मस्य॒ निहि॑तं प॒दं वेः । शी॒र्ष्णः क्षी॒रं दु॑ह्रते॒ गावो॑ अस्य व॒व्रिं वसा॑ना उद॒कं प॒दापुः॑ ॥ (७)
जो यह सब भली प्रकार जानता है, वह बतावे. इस सुंदर सूर्य का स्वरूप अत्यंत गूढ़ है. शिर के समान सबसे ऊंचे सूर्य की किरणों रूपी गाएं दूध के समान जल बरसाती हैं. वे ही किरणें विशाल तेज से तप्त होने पर जल निर्माण की तरह ही पी लेती हैं. (७)
Tell him who knows all this well. The appearance of this beautiful sun is extremely esoteric. The highest sun's rays like the head are rainy water like milk. Those same rays drink the same as water formation when heated by huge radiance. (7)

ऋग्वेद (मंडल 1)

ऋग्वेद: | सूक्त: 164
मा॒ता पि॒तर॑मृ॒त आ ब॑भाज धी॒त्यग्रे॒ मन॑सा॒ सं हि ज॒ग्मे । सा बी॑भ॒त्सुर्गर्भ॑रसा॒ निवि॑द्धा॒ नम॑स्वन्त॒ इदु॑पवा॒कमी॑युः ॥ (८)
पृथ्वीरूपी माता जलवर्षा के निमित्त आकाश स्थित सूर्यरूपी पिता की यज्ञरूपी कर्म द्वारा पूजा करती है. इससे पहले ही पिता अभिप्राय वाले मन से धरती से संगत हुए हैं. इसके बाद गर्भ धारण करने की इच्छा वाली माता गर्भ की उत्पत्ति के हेतु जल से बिंध गई है. उन अनेक प्रकार की फसलें-गेहूं, जौ आदि उत्पन्न करने के लिए आपस में बातचीत की . (८)
Mother earth worships the sun-like father in the sky by sacrificial karma on the occasion of water rain. Before this, the Father has been compatible with the earth with the mind of the intention. After this, the mother who wants to conceive has been pierced with water for the birth of the womb. They interacted with each other to produce many kinds of crops - wheat, barley, etc. (8)
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