ऋग्वेद (मंडल 1)
द्वाद॑शारं न॒हि तज्जरा॑य॒ वर्व॑र्ति च॒क्रं परि॒ द्यामृ॒तस्य॑ । आ पु॒त्रा अ॑ग्ने मिथु॒नासो॒ अत्र॑ स॒प्त श॒तानि॑ विंश॒तिश्च॑ तस्थुः ॥ (११)
सत्यरूपी सूर्य का बारह आरों वाला पहिया स्वर्ग के चारों ओर बार-बार चलता है और कभी पुराना नहीं होता, हे आदित्यरूप अग्नि! तीन सौ साठ दिन एवं रातों के रूप में तुममें सात सौ बीस पुत्रपुत्रियां रहती हैं. (११)
The twelve-saw wheel of the sun moves around heaven again and again and never gets old, O Adityarup Agni! Three hundred and sixty days and nights as you have seven hundred and twenty sons and daughters. (11)