हरि ॐ

ऋग्वेद (Rigved)

ऋग्वेद 1.164.35

मंडल 1 → सूक्त 164 → श्लोक 35 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

ऋग्वेद (मंडल 1)

ऋग्वेद: | सूक्त: 164
इ॒यं वेदिः॒ परो॒ अन्तः॑ पृथि॒व्या अ॒यं य॒ज्ञो भुव॑नस्य॒ नाभिः॑ । अ॒यं सोमो॒ वृष्णो॒ अश्व॑स्य॒ रेतो॑ ब्र॒ह्मायं वा॒चः प॑र॒मं व्यो॑म ॥ (३५)
यह वेदी ही पृथ्वी की समाप्ति है एवं यह यज्ञ संसार की उत्पत्ति का स्थान है. यह सोमरस वर्षा करने वाले घोड़े का वीर्य है एवं यह ब्रह्मा वाणियों का अंतिम स्थान है. (३५)
This altar is the end of the earth and this yajna is the place of origin of the world. This is the semen of the horse that rained the Somras and is the last place of the Brahma Vanis. (35)