हरि ॐ

ऋग्वेद (Rigved)

ऋग्वेद 1.164.41

मंडल 1 → सूक्त 164 → श्लोक 41 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

ऋग्वेद (मंडल 1)

ऋग्वेद: | सूक्त: 164
गौ॒रीर्मि॑माय सलि॒लानि॒ तक्ष॒त्येक॑पदी द्वि॒पदी॒ सा चतु॑ष्पदी । अ॒ष्टाप॑दी॒ नव॑पदी बभू॒वुषी॑ स॒हस्रा॑क्षरा पर॒मे व्यो॑मन् ॥ (४१)
मध्यमा वाणी वर्षा के जल का निर्माण करती हुई शब्द करती है. वह समय-समय पर एकपदी, द्विपदी, चतुष्पदी, अष्टपदी अथवा नवपदी हो जाती है. वह कभी हजार अक्षरों वाली बनकर विशाल आकाश में पहुंचती है. (४१)
The medium voice makes the word forming rain water. It periodically becomes unipodial, binomial, quadrupedal, ashtapadi or navapadi. She sometimes reaches the vast sky with a thousand letters. (41)