हरि ॐ

ऋग्वेद (Rigved)

ऋग्वेद 1.164.51

मंडल 1 → सूक्त 164 → श्लोक 51 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

ऋग्वेद (मंडल 1)

ऋग्वेद: | सूक्त: 164
स॒मा॒नमे॒तदु॑द॒कमुच्चैत्यव॒ चाह॑भिः । भूमिं॑ प॒र्जन्या॒ जिन्व॑न्ति॒ दिवं॑ जिन्वन्त्य॒ग्नयः॑ ॥ (५१)
एक ही प्रकार का जल है. वह गरमी के दिनों में ऊपर जाता है एवं वर्षा के दिनों में नीचे आता है. बादल धरती को प्रसन्न करते हैं एवं अग्नि झुलोक को संतुष्ट करती है. (५१)
There is the same type of water. He goes up on the hot days and comes down on rainy days. Clouds please the earth and fire satisfies the flames. (51)