ऋग्वेद (मंडल 1)
को वो॒ऽन्तर्म॑रुत ऋष्टिविद्युतो॒ रेज॑ति॒ त्मना॒ हन्वे॑व जि॒ह्वया॑ । ध॒न्व॒च्युत॑ इ॒षां न याम॑नि पुरु॒प्रैषा॑ अह॒न्यो॒३॒॑ नैत॑शः ॥ (५)
हे आयुधधारी मरुतो! जबड़ों को चलाने वाली जीभ के समान तुम्हारे भीतर रहकर तुम्हें कौन चलाता है? अर्थात् कोई नहीं. जल बरसाने वाला बादल जिस प्रकार दिन में चलता है, उसी प्रकार यजमान अन्न प्राप्त करने के लिए तुम्हें चलाता है. (५)
O warrior Maruto! Who drives you by staying within you like a tongue that runs your jaws? i.e. none. Just as the cloud that rains water moves in the day, so the host drives you to get food. (5)