ऋग्वेद (मंडल 1)
स्तु॒तासो॑ नो म॒रुतो॑ मृळयन्तू॒त स्तु॒तो म॒घवा॒ शम्भ॑विष्ठः । ऊ॒र्ध्वा नः॑ सन्तु को॒म्या वना॒न्यहा॑नि॒ विश्वा॑ मरुतो जिगी॒षा ॥ (३)
हे मरुतो! स्तुति सुनकर हमें सुखी करो. सर्वाधिक सुखदाता इंद्र हमें प्रसन्न करें. हे मरुतो! हम जितने दिन जीवित रहें, वे दिन सबसे अधिक उत्तम, चाहने योग्य एवं भोगपूर्ण हों. (३)
O Maruto! Make us happy by listening to praise. May indra, the most happy, please us. O Maruto! The days we live, the best, the most enjoyable, are the days we have. (3)