हरि ॐ

ऋग्वेद (Rigved)

ऋग्वेद 1.173.2

मंडल 1 → सूक्त 173 → श्लोक 2 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

ऋग्वेद (मंडल 1)

ऋग्वेद: | सूक्त: 173
अर्च॒द्वृषा॒ वृष॑भिः॒ स्वेदु॑हव्यैर्मृ॒गो नाश्नो॒ अति॒ यज्जु॑गु॒र्यात् । प्र म॑न्द॒युर्म॒नां गू॑र्त॒ होता॒ भर॑ते॒ मर्यो॑ मिथु॒ना यज॑त्रः ॥ (२)
यजमान हव्य देने वाले अध्वर्यु को साथ लेकर इंद्र की पूजा करते हैं. वे सोचते हैं कि इंद्र प्यासे मृग के समान हव्य के प्रति शीघ्र आ जाएंगे. हे बलशाली इंद्र! स्तोत्र की इच्छा करने वाले देवों की स्तुति करता हुआ होता, यजमान एवं उसकी पत्नी भली प्रकार यज्ञ पूरा करते हैं. (२)
The hosts worship Indra by taking the giving of havan with adhwaryu. They think that Indra will soon come to Havya like a thirsty antelope. O mighty Indra! Praising the gods who wish for the psalms, the host and his wife perform the yajna well. (2)