हरि ॐ

ऋग्वेद (Rigved)

ऋग्वेद 1.175.6

मंडल 1 → सूक्त 175 → श्लोक 6 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

ऋग्वेद (मंडल 1)

ऋग्वेद: | सूक्त: 175
यथा॒ पूर्वे॑भ्यो जरि॒तृभ्य॑ इन्द्र॒ मय॑ इ॒वापो॒ न तृष्य॑ते ब॒भूथ॑ । तामनु॑ त्वा नि॒विदं॑ जोहवीमि वि॒द्यामे॒षं वृ॒जनं॑ जी॒रदा॑नुम् ॥ (६)
हे इंद्र! तुमने प्राचीन स्तोताओं को उसी प्रकार सुख दिया, जिस प्रकार जल प्यासे व्यक्ति को प्रसन्न करता है. इसी कारण हम बार-बार तुम्हारी स्तुति करते हैं कि हम अन्न, बल और दीर्घ आयु प्राप्त कर सकें. (६)
O Indra! You have given happiness to the ancient stoetas in the same way that water pleases the thirsty person. That is why we praise you again and again that we may gain food, strength, and long life. (6)